जोखिम से भी चैरिटी के लिए धन जुटाना संभव

वर्ष 2005 में अमीरात एयरलाइंस की क्रू मेंबर मारिया कांस्किाओ ने ढाका (बांग्लादेश) में बच्चों के जीवन पर गरीबी के प्रभाव को देखा। उन्हें अपना बचपन याद आ गया। उनकी मां उनका पालन-पोषण नहीं कर सकती थीं, क्योंकि वह अल्जाइमर की मरीज थीं। इसलिए एक अंगोलाई शरणार्थी क्लीनर क्रिस्टिना जिनके छह बच्चे थे, ने उसे गोद ले लिया। किसी गरीब अश्वेत महिला द्वारा श्वेत बच्चे को पालना सामान्य बात नहीं थी। पुर्तगाल के अधिकारी इसकी अनुमति देने को तैयार नहीं थे। उसने तमाम बाधाओं के बाद भी हार नहीं मानी और अधिकारियों से संघर्ष करती रही। इस बीच क्रिस्टिना की मौत हो गई, तब मारिया की उम्र 12 साल थी। मारिया ने खुद को संभाला और एयरलाइंस में क्रू मेंबर के रूप में नौकरी हासिल कर ली। उसने गोद लेने वाली मां का कर्ज चुकाने के लिए मारिया क्रिस्टिना फाउंडेशन बनाया। 2005 में ढाका की झुग्गी बस्ती में फाउंडेशन का स्कूल खोलने में उसके दोस्तों और शुभचिंतकों ने मदद की। कुछ दिनों की मेहनत के बाद स्कूल के होनहार बच्चे दुबई में हायर एजुकेशन के लिए गए, जहां फाउंडेशन ने अनेक युवा दंपत्तियों के माध्यम से इन्हें नौकरी दिला दी। हालांकि तीन साल बाद पैसों की कमी के चलते फाउंडेशन का स्कूल बंद हो गया।

मारिया को स्कूल चलाने के लिए दस लाख डॉलर की जरूरत थी। धन इकट्ठा करने के लिए उसने एवरेस्ट फतह का अभियान शुरू किया। मारिया पूरे सालभर सुबह साढ़े पांच बजे उठती और चार घंटे तक अपनी पीठ पर 25 से 29 किलो का वजन लेकर दुबई के मरीना में चढ़ाई पर चढ़ती। नेपाल रवाना होने से पहले उसने प्रतिदिन करीब 250 मंजिल के बराबर चढ़ाई की। उन्होंने लगातार स्वीमिंग, रनिंग और योग के माध्यम से हार्ट की फिटनेस को बनाए रखने की भरसक कोशिश की। इसके साथ ही उन्होंने भारत के नेहरू इंस्टीट्यूट आफ माउंटेनियरिंग में 28 दिन का कोर्स किया। वे क्रएञ्ज ग्रेड में पास हुईं। उन्होंने टेक्निकल ट्रेनिंग के बतौर किलीमंजारो (अफ्रीका), एलब्रस (यूरोप) और एकांकागुआ (दक्षिण अमेरिका) में कई चोटियों पर चढ़ाई की।

मारिया अपने अभियान के बीसवें दिन माउंट एवरेस्ट की ओर 8600 मीटर ऊंचाई पर पहुंच गई। वहां शरीर को जमा देने वाला माइनस 14 डिग्री का तापमान था। उन्होंने अपने एक हाथ से गाइड की रस्सी को मजबूती से पकड़ रखा था। उनके ऊपर बर्फ की पतली चादर चढ़ गई थी। उन्होंने बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी को बर्फ में मारा और एवरेस्ट की चोटी को देखा। हजारों मीटर की ऊंचाई से नीचे देखने पर उन्हें वास्तविकता का आभास हुआ।

उन्हें अहसास था कि यहां गलती की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि एवरेस्ट पर छोटी सी गलती भी माफ नहीं होती। वे यहां एक उद्देश्य लेकर आई थीं और अभी मरना नहीं चाहती थीं। अचानक उनका गाइड सत्यव्रत डेम चिल्लाया, आप तेजी से ऊपर नहीं चढ़ रही हैं। जल्द आगे बढि़ए या फिर कैंप वापस लौटने के लिए तैयार रहिए।

गाइड को भय था कि अगर मौसम खराब हो गया तो मारिया चोटी पर नहीं पहुंच पाएगी। उधर मारिया के दिमाग में उसके फाउंडेशन के 600 बच्चों का चेहरा घूम रहा था। वह जानती थी कि उनकी आशा की वह अकेली किरण है। एक क्षण के लिए उन्हें अपनी गोद लेने वाली मां क्रिस्टिना की याद आई, जिन्होंने उसे करुणा और लगन जैसे मूल्य दिए थे। उसने अपने सिलेंडर से ऑक्सीजन के लेवल को प्रति मिनट दो से बढ़ाकर तीन लीटर कर दिया ताकि उसकी ताकत बढ़े। इसके साथ वह अपने गाइड को पीछे छोड़कर चोटी पर पहुंच गई।

ग्लोबल आर्थिक संकट का सामना करने के लिए लोगों को न केवल धन जुटाने, बल्कि अपना अस्तित्व बनाए रखने के कौशल को पैना करने के लिए शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण काम हाथ में लेना चाहिए।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट फंडा

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