ज्यादा से ज्यादा युवा पेशेवर खेती की तरफ जा रहे हैं क्योंकि यह उनका ध्यान चिंताओं से हटाता है, जो कार्यस्थल पर मिडलाइफ क्राइसेस का सामना कर रहे हैं

तीन महीने पहले जब कटहल का मौसम था, तब मेरे एक दोस्त ने चैट ग्रुप पर कटहलों की तस्वीरें डाली, जो उसकी नाशिक (महाराष्ट्र) स्थित दूसरी प्रॉपर्टी में ऊगे थे, जिसे वो रिटायरमेंट होम कहता है। यह हमारे लिए नया नहीं था। वह कई सालों से जब भी वह एक महीने के लिए वहां रहता, आम और कठहल की तस्वीरें भेजता रहा है। इस बार भी यही परंपरा निभाकर वह अचानक गायब हो गया। फिर हाल ही में वापस आया।

सितंबर मध्य से वह न सिर्फ मुंह में पानी लाने वाली हरी सब्जियों की तस्वीरें डाल रहा है, बल्कि उसने चैट ग्रुप में पोस्ट की झड़ी लगा दी है। उसने हमें कभी नहीं बताया कि चार महीने पहले उसकी नौकरी चली गई थी। वह इतने दिन इसलिए खामोश नहीं रहा कि वह नौकरी तलाश रहा था। उसे मार्च में मिल रहे वेतन से आधे वेतन की नौकरी पहले ही मिल गई थी जिसमें वह कहीं से भी काम कर सकता था। वह गायब इसलिए था कि वह अपना समय और पैसा सब्जी का खेत तैयार करने में खर्च कर रहा था। दोस्त कहता है कि उसे इन महीनों में जीवन और बाजार की अनिश्चितताओं का अहसास हुआ। लॉकडाउन में मिले अतिरिक्त समय ने उस जैसे लोगों को एग्रो-फॉरेस्ट्री (कृषि-वानिकी) व्यापार की योजना बनाने का मौका दिया।

लोगों को अहसास हुआ है कि अनुभव भी कमाई और बचत जितने जरूरी हैं। अब मेरे दोस्त की सभी को सलाह है कि खेती में लंबी अवधि में फायदे हैं और इससे युवा पेशेवरों को मिड-लाइफ क्राइसिस को हराने में मदद मिलेगी। रोचक यह है कि उसने अपने फार्म में और अधिक निर्माण कर रहने की जगहें बढ़ाने की योजनाएं रद्द कर दी हैं और सोच रहा है कि खेती के लिए ज्यादा जगह कैसे मिले। वास्तव में ‘अपार्टमेंट कल्चर’ कई लोगों को ऐसे वेंचर्स की ओर ला रहा है। किसी भी एसेट मैनेजमेंट कंपनी से पूछ लीजिए। उनके पास बड़े शहरों के पास खेती की जमीन की कम से कम पांच इंक्वायरी जरूर हैं।

खुली जगहों की मांग कभी इतनी ज्यादा नहीं रही। ज्यादा से ज्यादा युवा पेशेवर खेती की तरफ जा रहे हैं क्योंकि यह उनका ध्यान चिंताओं से हटाता है और हर सुबह उन्हें देखने के लिए कुछ होता है।केरल के गांव इरिट्‌टी के बृजिथ कृष्णा का उदाहरण ले लीजिए। उनकी भी नौकरी चली गई थी। जब वे अपने गांव आए तो उनके पास उनके ही खेतों के तीन क्विंटल काजू बचे थे जो लॉकडाउन की वजह बिक नहीं पाए थे। लेकिन उन्होंने काजुओं को नए अवतार में बेचने का फैसला लिया, साबुत दाने के रूप में नहीं, बल्किन अंकुरित काजू के रूप में। पिछले चार महीनों में न सिर्फ उनके काजुओं की मांग बढ़ी है, बल्कि उन्होंने प्रोसेस करने के लिए बाजार से एक टन काजू और खरीदे हैं। मडक्काथारा की केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के तहत कैश्यू रिसर्च स्टेशन ने कृष्णा को अंकुरित काजू बनाने की तकनीक दी।

वे खुद भी अंकुरित काजू बेच रहे हैं। यह इसलिए भी मशहूर हैं क्योंकि अंकुरित काजू में फैट आधा हो जाता है और सामान्य दाने की तुलना में ज्यादा आयरन, कैल्शियम और फाइबर होता है। कैलोरी को लेकर सजग लोग अंकुरित दानों का इस्तेमाल करते हैं।

एसी वाले माहौल में नारियल जटा के साफ गूदे के साथ एक के ऊपर एक रखी प्लास्टिक ट्रे में काजू दाने अंकुरित होते हैं। 16वें दिन स्प्राउट्स स्वादिष्ट होते हैं व इन्हें 90 दिन तक इस्तेमाल कर सकते हैं।

फंडा यह है कि देश के उन युवाओं में अब अपार्टमेंट में रहने और खेत में काम करने का नया ट्रेंड दिख रहा है, जो कार्यस्थल पर मिडलाइफ क्राइसेस का सामना कर रहे हैं।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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