तीन पहियों का सपना है तो ऑटो का नहीं, प्लेन का हो

गणेश चतुर्थी के उत्सव के दौरान, एक टेलर शॉप पर जहां मैं अपने सूट सिलवाता हूं, मेरी मुलाकात अपने अखबार वाले वेंडर रितेश से हुई। उसने मुझे नमस्ते किया और तीन सूट लेकर स्टोर से बाहर जाने लगा तो उसे देखकर मुझे बड़ी हैरानी हुई। मैंने उससे ऐसे पूछ लिया “क्या घर में किसी की शादी है’? जवाब सुनकर मैं दंग रह गया। वह बोला “नहीं सर, मेरा बेटा अगले साल मार्च में आईआईएम लखनऊ से ग्रेजुएट हो जाएगा और उसके कैम्पस इंटरव्यू अगले महीने से शुरू हो जाएंगे, इसीलिए मैंने उसके सूट सिलवाए हैं’। मेरे दिमाग में बीती बातें घूम गईं, क्योंकि कुछ साल पहले तक उसका बेटा मेरे घर रोज अखबार डालने आता था और पिता का हाथ बंटाता था। वह आईआईएम से गूगल में जॉब के लिए पहले ही शॉर्ट लिस्टेड हो गया है! अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले महीने ऑफर लेटर उसके हाथ में होगा।

इस वाकये ने मुझे एक और ऐसे ही योद्धा नागपुर के रहने वाले श्रीकांत पंटावने की याद दिला दी जो हर मुश्किल से लड़कर आगे बढ़े। उनकी कहानी एक डिलीवरी ब्वॉय के रूप में शुरू हुई। एक सिक्यूरिटी गार्ड के बेटे होने की वजह से उनके सामने ज़िंदगी की तमाम मुश्किलें थीं, लेकिन कोई मौका नहीं था। गुजारे की लड़ाई लड़ते रहना उनकी नियति बन गई थी, और इसीलिए श्रीकांत ने कम उम्र में ही परिवार की आर्थिक मदद के लिए काम करना शुरू कर दिया। लेकिन ज़िंदगी में उसके सपने बड़े थे और इसीलिए वह काम और पढ़ाई के बीच एक संतुलन बनाकर रखता था। वह सामान की डिलीवरी करता और उसी बीच स्कूल भी जाता ताकि घर में कुछ पैसे आ सकें। इसके बाद उसने इस उम्मीद के साथ एक ऑटो खरीद लिया कि उसकी कमाई से परिवार का संघर्ष कुछ कम हो जाएगा। ऑटो के तीन पहियों से उसकी ज़िंदगी में भी गति आ गई। लेकिन, उसने यह कभी नहीं सोचा था कि ये पहिये कभी इतने बड़े हो जाएंगे कि लोगों को उन्हें देखने के लिए सिर को ऊंचा उठाकर आसमान ताकना पड़ेगा! जी हां, वही लड़का जो कभी नागपुर की सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाता था, आखिरकार अपनी मेहनत से 2016 में कमर्शियल पायलट बना और इंडिगो एयरलाइंस में काम करने लगा।

श्रीकांत की ज़िंदगी में टर्निंग पॉइंट उस समय आया जब वे एक दिन नागपुर एयरपोर्ट पर कुछ सामान पहुंचाने गए थे, तभी अचानक उन्होंने एक प्लेन के लैंड होने की जोरदार आवाज सुनी। वे वहीं पर रुक गए और प्लेन को रनवे के आखिर तक जाने और उसे पार्किंग क्षेत्र में लौटकर आते हुए देखते रहे। वहीं पर उन्होंने कुछ स्मार्ट लोगों को शानदार यूनिफॉर्म में देखा। इन्हें देख उनके मन में उनके बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तो वे पास में एक चाय की दुकान पर गए और वहां खड़े कुछ पढ़े-लिखे लोगों से पूछने लगे। उन्हें बताया गया कि यूनिफॉर्म पहने ये लोग पायलट हैं और वे प्लेन उड़ाते हैं। उनकी जिज्ञासा और बढ़ी तो उन्होंने पूछा कि पायलट कैसे बनते हैं? लेकिन, वहां खड़े लोगों के जवाब ने उनके जोश को ठंडा कर दिया। उसे बताया गया कि पायलट का कोर्स करने के लिए न तो उनके पास शिक्षा थी, और न ही पैसा। बावजूद इसके, उन्होंने उस दिन खुद से कहा “मैं एक दिन जरूर पायलट बनूंगा।’

उन्हें पता चला कि 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें एक और परीक्षा देनी पड़ेगी ताकि डीजीसीए के माध्यम से भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली स्कॉलरशिप मिल जाए और वे पायलट ट्रेनिंग के लिए होने वाला खर्च उठा सके। यह जानकारी श्रीकांत का उत्साह बढ़ाने के लिए काफी थी और उन्होंने तुरंत ही उस स्कॉलरशिप के लिए तैयारी शुरू कर दी।

वे दिनभर ऑटो चलाने के बाद रात को में परीक्षा की तैयार करता। अपनी मेहनत से 2011 में वे स्कॉलरशिप के लिए क्वालिफाई हो गए। उन्होंने मध्य प्रदेश के सागर की चाइम्स एविएशन अकेडमी में प्रवेश ले लिया। उनकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी, तो दोस्तों ने मदद की और उन्होंने स्वयं रात के 2 बजे तक मेहनत करके इस भाषा पर पकड़ बना ली। जब वे पास हो गए तो उनकी उमंगे आसमान जितनी थीं, लेकिन विमान इंडस्ट्री के हालात ठीक नहीं थे। वे बतौर एक्जीक्यूटिव नागपुर में नौकरी करने लगे और काम करते हुए फिर से परीक्षा दी और 2013 में उनका चयन सेंट्रल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, हैदराबाद के लिए हो गया। यहां से सफलतापूर्वक प्रशिक्षण लेने के बाद उन्हें इंडिगो एयरलाइंस में बतौर को-पायलट चुन लिया गया। ध्यान दीजिए, वे फिर से तीन पहियों पर थे, फर्क इतना है कि ये पहिये एक प्लेन के थे!

फंडा बहुत ही सरल है- सपने बड़े देखो और कभी हार मत मानो।

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