दिव्यांगजनों का सहयोग करें, साथ ही आपको शारीरिक रूप से परिपूर्ण इंसान बनाने के लिए अपने रचनाकार को धन्यवाद कहना न भूलें

Management Funda By N. Raghuraman

उसकी सुबह भी अलार्म घड़ी के चिल्लाने से शुरू होती है, जिसे वह बंदकर फिर थोड़ी देर सो जाती है, जैसा कि हम सभी करते हैं। उसके दिन की शुरुआत एक कप चाय से होती है, जो वह खुद बनाती है। कुछ देर मोबाइल पर बिताने और फिर मैचिंग बिंदी, आंखों में काजल लगाकर, तैयार होने में थोड़ा ज्यादा समय खर्च करने के बाद वह कुछ घंटे ऑनलाइन रहती है। फिर उसे कोई केरल का मीठा व्यजंन ‘उन्नीअप्पम’ खाने देता है, जिसे न कहना उसके लिए मुश्किल है। लेकिन मिठाई खाने से पहले वह 20 सेकंड से ज्यादा के लिए हैंडवॉश इस्तेमाल करती है। फिर ‘उन्नीअप्पम’ का स्वाद लेते हुए वह पूछती है, ‘अगर मेरे लिए हैंडवॉश इस्तेमाल करना इतना आसान है, तो फिर आप क्यों नहीं करते हैंड वॉश?’

क्या आप सोच रहे हैं उसने यह सवाल क्यों किया? उसने यह इसलिए पूछा क्योंकि उसके पैर ही उसके हाथ हैं! जी हां, उसके दोनों हाथ नहीं हैं और वह ऊपर दिए गए सारे काम खुशी-खुशी पैरों से करती है। यह हाल ही में रिलीज हुए सैवलॉन हैंडवॉश के विज्ञापन की कहानी है। मुझे यह विज्ञापन इस हफ्ते तब याद आया जब संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी शाखा के तहत काम करने वाले, न्यूयॉर्क स्थित यूएन वर्ल्ड डेटा फोरम ने अपनी ‘1 मिनट वॉइसेस ऑफ यूथ’ प्रतियोगिता के वीडियोज की शीर्ष 10 की सूची जारी की। इन 10 में उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग की 16 वर्षीय बच्ची आशा पटवाल भी शामिल है। एक मिनट लंबे वीडियो में इस दृष्टिहीन और बधिर टीनएजर ने डुअल डिसएबिलिटी (दोहरी दिव्यांगता) के शिकार लोगों को जनगणना में विशेष रूप से शामिल करने पर अपनी बात रखी है।

बिना आवाज वाले इस वीडियो में वह इशारों से कहती है, ‘हमें जनगणना में पहचान नहीं मिलती और कोई नहीं जानता कि दुनिया में हमारे जैसे कितने लोग हैं। हमें जनगणना में शामिल करें और दूसरों को प्रेरित करने का मौका दें।’ आशा अपने पिता और दो भाई-बहनों की तरह ही जन्मजात दृष्टिहीन है। फिर एक बार क्रिसमस की छुटि्टयों के दौरान वह रुद्रप्रयाग गई तो उसे मैनिनजाइटिस हो गया। ध्यान न देने की वजह से उसकी सुनने की क्षमता चली गई। वह अब दसवीं में पढ़ती है। वह डुअल डिसएबिलिटी के बारे में और जानने के लिए तथा ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए अमेरिका जाना चाहती है। उसका वीडियो देहरादून में दृष्टिहीनों के विद्यालय ‘शार्प मैमोरियल स्कूल’ की प्राचार्य सुमाना सैमुअल ने शूट किया था, जहां आशा पढ़ती है।

इससे मुझे दैनिक भास्कर की पाठक और शिक्षाविद्, बिलासपुर की शुभदा जोगलेकर का एक किस्सा याद आया जो उन्होंने मुझसे साझा किया था। वे अपनी मित्र सुजाता अय्यर के निवेदन पर एक बार बधिर छात्रों को पेंटिंग सिखाने गई थीं। कुछ को कोंदा और कोंदी (छत्तीसगढ़ी में मूक और बधिर) कहकर पुकारा जाता था और उनका खुद का कोई नाम नहीं था। उनमें से कुछ 11वीं या 12वीं में पढ़ते थे। उनमें एक लड़का था, गोकरण। मूक-बधिर होने के अलावा उसके हाथ भी नहीं थे। वह सबकुछ अपने पैरों से करता था और शायद चित्रकला की कक्षा में सर्वश्रेष्ठ था। वे सभी बच्चे अनुशासित और पूरी तरह ईमानदार थे। जोगलेकर याद करती हैं कि दस दिन की कार्यशाला के दौरान उनका एक भी कलर पेन नहीं खोया। वे कहती हैं कि ये उनके 40 साल के कॅरिअर के सबसे ज्यादा प्यारे छात्र थे।

फंडा यह है कि अपने हाथ से अलार्म बंद करें लेकिन आपको शारीरिक रूप से परिपूर्ण इंसान बनाने के लिए अपने रचनाकार को धन्यवाद कहना न भूलें। साथ ही दिव्यांगजनों का सहयोग करें।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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