धरती बेहतर बनाने के लिए सभी की आस्था का सम्मान करें

हाल ही में मैंने एक अमीर खरीदार को ज्वेलरी की दुकान पर जूते बाहर उतारने से इनकार करते देखा। झगड़ा शुरू हो गया। खरीदार ने कहा कि वह जूते पहनकर सड़क पर जाता ही नहीं। चूंकि दुकानदार को लगता था कि चाहे घर हो या दुकान, जूते पहनकर चलना वायरस फैलने का प्रमुख कारण है, इसलिए उसने खरीदार को अंदर नहीं आने दिया। दुकानदार को बिजनेस चाहिए था, लेकिन वह झुका नहीं। खरीदार बिना कुछ खरीदे चला गया। आपको रामायण का वह एपीसोड याद है, जिसमें भगवान राम के वनवास की खबर लगने पर गुहा मदद के लिए आता है। जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ गंगा नदी पार करने पहुंचे तो गुहा ने केवट को नाव लाकर उन्हें ले जाने का इशारा किया। केवट ने गुहा से पूछा कि क्या वह भगवान को नाव पर बैठाने से पहले उनके चरण धो सकता है। गुहा ने कहा कि भगवान के नाव में बैठ जाने पर वह ऐसा कर सकता है। केवट ने इनकार कर दिया। गुहा उसकी जिद से नाराज हो गया। फिर केवट ने अपनी बात भगवान राम को स्वयं समझाई, ‘प्रभु, नाविक होने के कारण मेरी सीमित आय है, जो मेरी आवश्यकताओं के लिए ही पर्याप्त है। मैं और नावें चलाने में सक्षम नहीं हूं। इसलिए नाव में बैठने से पहले मुझे आपके चरण धोने दीजिए।’ राम सीता की ओर देख मुस्कुराए और शांत रहे। केवट आगे बोला, ‘प्रभु, मैंने सुना है कि जंगल में आपके चरणों की धूल के आशीर्वाद से एक शिला स्त्री बन गई। मेरी नाव तो लकड़ी के कई टुकड़ों से बनी है और अगर आपके चरणों की धूल उनपर पड़ेगी तो मुझे भय है कि कहीं नाव कई स्त्रियों में न बदल जाए। मैं परिवार में और अधिक लोगों का भरण-पोषण नहीं कर सकता।’ भगवान ने निवेदन स्वीकार कर लिया। चरण धोने के बाद केवट ने अपने हाथ धरती पर रखे और भगवान से नाव में कदम रखने से पहले, पहला कदम हाथ पर रखने का कहा। फिर केवट उन्हें नदी के पार ले गया। सीता ने केवट को आभार स्वरूप अंगूठी देनी चाही। यह दूसरी कहानी है कि केवट ने यह कहते हुए अंगूठी लेने से मना कर दिया कि समान पेशे वाले एक-दूसरे से सेवाओं के पैसे नहीं लेते। जब स्वयं श्रीराम सोच में पड़ गए कि केवट क्या कह रहा है, तब उसने समझाया, ‘मैं लोगों को एक घाट से दूसरे पर ले जाकर गंगा पार कराता हूं। आप भी लोगों को इस जीवन की यात्रा के माध्यम से संसार रूपी सागर पार कराते हैं।’ भगवान केवट के समर्पण से अभिभूत हो जाते हैं और कहानी खत्म हो जाती है। अब मेरा सवाल है कि खरीदार दुकानदार से जूते उतरवाने का कारण क्यों नहीं पूछ सकता था? इसका कारण यह था कि दुकान नीचे बिछाई जाने वाली गद्दियों से भरी थी, जिनका सफेद कवर जूतों की धूल से गंदा हो सकता था। और अभिषेक बच्चन की वेब सीरीज ‘ब्रीद’ में जर्मोफोबिक (कीटाणुओं से डरने वाला) सरदारजी के किरदार की तरह ही ज्वेलर के लिए धूल-मिट्‌टी ही सारे फसाद की जड़ थी। ज्वेलर के लिए गद्दियों के कवर धोना उतना ही कष्टदायी होता, जितना केवट के लिए भगवान के चरणों की धूल से नाव का कई स्त्रियों में बदल जाना। फंडा यह है कि हर किसी के पास अपनी आस्था और विश्वास का कोई कारण होता है। उस आस्था का आपसी सम्मान ही इस दुनिया को रहने के लिए बेहतर जगह बनाता है।

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