नई जिम्मेदारी से पहले मजबूत रिश्ते जरूरी

2 015 की बात है, हम 10 लोग एक मीटिंग में थे जिसमें इंसान में गहरी मानवीय भावना (दयालुता) पैदा करने के तरीकों पर बातचीत हो रही थी। उद्देश्य था कि हम एक कम्पनी को गहराई से समझें और यह देखें कि वर्कप्लेस पर खुशियां बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए ताकि कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ सके। संक्षेप में, यह एक नया वर्क कल्चर बनाने की कवायद थी जिसे अमल में लाकर कर्मचारियों में संतुष्टि का स्तर बढ़ सकता है और दूसरों की तुलना में कम्पनी की छवि सुधरती है।
जब चर्चा हो रही थी तो अमेरिका की युवा महिला उद्यमी का मोबाइल फोन बजा। चूंकि मैं उसके ठीक बगल में बैठा था तो मुझे दूसरी ओर से आ रही एक पुरुष की आवाज साफ सुनाई दे रही थी जो कह रहा था “डॉग को मैं अपने पास रख रहा हूं।’ यह सुनकर सेकंड से भी कम समय में वह महिला बिफर गई और टेबल पर मुक्का मारते हुए फोन पर चिल्लाने लगी “यह तुम मेरी लाश पर करना, मैं उसकी कस्टडी के लिए लड़ूंगी और तुम्हारा ‘विजिटेशन अधिकार’ छीन लूंगी।’ अब मीटिंग का रुख बदल गया था क्योंकि उस महिला की व्यक्तिगत परेशानी सार्वजनिक हो गई थी। दरअसल, उसका तलाक हो रहा था और उसके पति ने धमकी दी थी कि पालतू डॉग को उसे नहीं देगा। महिला ने मीटिंग में ऐसे व्यवहार के लिए माफी मांगी और अपनी कहानी बताई। अगले पांच महीनों में उन दोनों के वकील मामले को सुलझाते रहे और साथ ही अपना बिल भी बढ़ाते रहे। आखिरकार उस महिला की जीत हुई और उसे अपने पालतू जानवर की कस्टडी मिल गई। हालांकि, हार्वे नाम के इस डॉग के लिए उसे अपने वकील को 25,000 डॉलर अतिरिक्त चुकाना पड़े। उसके पूर्व पति ने दोनों बेटियों की कस्टडी के लिए लड़ाई नहीं लड़ी क्योंकि वह जानता था कि वह जीत नहीं पाएगा। कोर्ट में जिस तर्क के आधार पर महिला को डॉग की कस्टडी मिली उसमें कहा गया कि चूंकि बच्चों को उससे बहुत लगाव है और इसलिए अगर डॉग से उन्हें दूर किया जाता है तो वे डिप्रेशन में चले जाएंगे। इस वाकये को मैं सोमवार की ही एक खबर से जोड़कर देखता हूं जिसमें हॉलीवुड की पूर्व मशहूर जोड़ी माइली साइरस और लियाम हेम्सवर्थ के बीच तलाक हो गया। उनके बीच कई दिनों से 15 पालतू जानवरों की कस्टडी को लेकर लड़ाई चल रही थी। हालांकि बाद में फैसला माइली के पक्ष में आया और उसे अपने मिनी एनिमल फार्म को अपने पास रखने की जिम्मेदारी मिल गई।
मैं सोच रहा था कि ये अमेरिकी लोग थोड़े पागल होते हैं और ऐसी घटनाएं भारत में कभी नहीं हो सकती। लेकिन मैं गलत था! वास्तव में ऐसी परिस्थितियां भारत में भी बहुत बन रही हैं। इंडिया इंटरनेशनल पेट ट्रेड फेयर के मुताबिक पेटकेयर इंडस्ट्री 17 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है और देश में हर वर्ष करीब 6 लाख पालतू जानवर घरों के सदस्य बन रहे हैं। तलाक विशेषज्ञ वकीलों के अनुसार उनके पास ऐसे मामले आए हैं जिसमें पत्नी ने अपने पालतू जानवर के लिए 10 लाख रुपए का हर्जाना भी छोड़ दिया। एक अन्य मामले में एक तलाकशुदा पति पालतू जानवर के लिए 10 हजार रुपए महीना ‘पेट सपोर्ट’ खर्च के रूप में चुका रहा है! एक दंपति के दिलचस्प मामले में तो दोनों ने तय किया कि वे अलग होने के बाद भी अपने पालतू जानवर की देखभाल हर हफ्ते बारी-बारी से करेंगे। चूंकि भारत में पालतू जानवर की कस्टडी को लेकर कोई प्रभावी कानून नहीं है और ज्यादातर फैसले दोनों पक्षों की सहमति से लिए जाते हैं। वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन में शादी से पहले ही यह लिखित समझौता हो जाता है कि, यदि भविष्य में तलाक होता है तो पालतू जानवर किसके पास रहेगा, उसकी मेडिकल जरूरतों का ध्यान कौन रखेगा और कौन उसके इंश्योरेंस समेत बाकी चीजों का खर्च उठाएगा।
हमारे देश में भी तलाक अब एक सामान्य बात हो चली है और इसके साथ ही पालतू जानवर मेट्रो लाइफ का जरूरी हिस्सा बनते जा रहे हैं क्योंकि उन्हें तनाव दूर करने वाला समझा जाता है। ऐसे में बेहतर तो यही है कि इन जानवरों को परिवार का सदस्य तभी बनाया जाए जब हमारे परिवार में सदस्यों के बीच रिश्ते मजबूत हो। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम इन मासूम जानवरों को नया तनाव दे देते हैं जिसके साथ उन्हें जिंदगीभर रहना पड़ेगा, जो कि उस जीव के प्रति क्रूरता होगी क्योंकि पति हो या पत्नी, वह तो दोनों से बराबर प्यार करता है।
फंडा ये है कि पालतू जानवर बड़ी जिम्मेदारी होते हैं और हमें उन्हें अपने परिवार का हिस्सा केवल तभी बनाना चाहिए जब हम स्नेह और समर्पण के साथ गृहस्थी की संतुलित नाव में सवारी कर रहे हो, न कि उस स्थिति में जबकि स्वयं मंझधार में फंसे हों!

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