निःसंदेह किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना सफलता की ओर पहला कदम है

इस शुक्रवार की सुबह मैं भारतीय-अमेरिकी मूल की प्रतिभाशाली युवा वैज्ञानिक और आविष्कारक गीतांजलि राव को सुन रहा था। उसे टाइम मैग्जीन ने अभी तक की पहली ‘किड ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। वह ‘तकनीक का इस्तेमाल कर दूषित पेयजल से लेकर अफीम की लत और साइबर बुलीइंग जैसे मुद्दों पर आश्यर्चजनक काम’ के लिए जानी जाती है।

बचपन से ही उसे किसी और के चेहरे पर मुस्कान लाकर खुशी मिलती थी। यह उसका रोज़ का लक्ष्य था। और जल्द ही यह इस काम में बदल गया कि जिस समाज में वह रह रही है, वहां कैसे सकारात्मकता ला सकती है। मुझे सच में उसका आत्मविश्वास, विज्ञान के प्रति समर्पण और उसका यकीन कि तकनीक हम सभी के जीने के तरीके को बदल सकती है, देखकर अच्छा लगा।

इस छोटी बच्ची के शब्दों ने मुझे आईआईएसईआर पुणे के साइंस एक्टििवटी सेंटर(सैक) में शोधकर्ताओं के एक समूह की याद दिला दी। जो छात्रों-शिक्षकों को मजेदार ऑनलाइन वीडियो के माध्यम से विज्ञान व गणित के मूल सिद्धांतों को समझाने की कोशिश कर रहे थे। इस समूह ने एमएससीईआरटी पुणे के सहयोग से राज्य बोर्ड के छात्रों के लिए विज्ञान-गणित के विभिन्न विषयों पर 10 एपिसोड्स बनाए। राज्य बोर्ड के कक्षा पांचवीं से दसवीं तक के छात्रों पर केंद्रित एक घंटे की ऑनलाइन कक्षा के एक सत्र में 15-20 गतिविधियां होती थीं।

किताबों के आधार पर तैयार की गईं 10 एपिसोड की शृंखला में 200 गतिविधियां शामिल की गई थीं ताकि बच्चे अवधारणाएं बेहतर समझ सकें। महामारी से पहले, सैक में अपने हाथों से की जा सकने वाली विविध गतिविधियों के लिए 60 हजार छात्र और 15 हजार शिक्षक आते थे। पर महामारी के बाद, सैक ने हर शनिवार को अंग्रेजी और हिंदी में एक घंटे की ऑनलाइन कक्षाएं कराने का निर्णय लिया, जिसमें शुरुआती 40 मिनट में सिखाया जाता है और 20 मिनट का वैज्ञानिकों से सवाल-जबाव सत्र होता है।

आज की स्थिति में इन वीडियोज़ को 20 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है, ये छात्रों और शिक्षकों के बीच लोकप्रिय हैं। चूंकि प्रतिक्रिया काफी अच्छी थी, ऐसे में वे सिर्फ गणित पर पांच और वीडियो बनाने की योजना बना रहे हैं।

मैं खुद इस बात पर दृढ़ता से यकीन करता हूं कि तकनीक का उपयोग सिर्फ समस्याएं हल करने के लिए नहीं होना चाहिए, यह जरूरी है कि इसका इस्तेमाल विभिन्न विषयों में जिज्ञासा और रुचि करने के लिए भी किया जाए। उदाहरण के लिए वीडियो शृंखला ‘वास्तुरुचि’ की कहानी। हममें से कई लोग अपने शहर में और इसके आसपास बने प्राचीन मंदिरों, प्रमुख बाज़ारों, आलीशान हवेलियों और किलों का समृद्ध इतिहास जाने बिना रोज़ाना इसके सामने से गुजरते हैं। शायद यही कारण है कि मुझे पुणे में रहने वाले आर्किटेक्ट दंपती किरण और अंजली कलमदानी की यूट्यूब शृंखला ‘वास्तुरुचि’ के जरिए इमारतों के पीछे की कहानियों को जीवंत करने का आइडिया पसंद आया।

पहला एपिसोड चिंचवड में पवना नदी के किनारे बसे मंदिर प्रांगण और मोरया गोसावी की समाधि पर था, जिसे काफी सराहा गया। मेरी व्यक्तिगत सोच है कि महात्मा फुले मंडी कॉम्प्लेक्स पर आने वाला उनका अगला एपिसोड देखना और ज्यादा रुचिकर होगा क्योंकि इस वयस्त थोक बाज़ार का स्वामित्व व संचालन पुणे नगर निगम के हाथों में है! स्वाभाविक तौर पर मंडी के इर्द-गिर्द ऐतिहासिक कहानी बुनना दिलचस्प होगा क्योंकि हर शहर में ऐसे छोटे-बड़े बाजार होते हैं और हरेक के अस्तित्व की कहानी होती है।

कुछ छात्रों की या कमज़ोर वर्ग की समस्याओं का समाधान निकालें, अपने शहर के भुला दिए गए इतिहास को खोदकर निकालें, लोगों को सशक्त बनाएं ताकि वे तकनीक के माध्यम से उभरती हुई परिस्थितियों का सामना कर सकें। फंडा यह है कि निःसंदेह किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना सफलता की ओर पहला कदम है।

फंडा यह है कि निःसंदेह किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना सफलता की ओर पहला कदम है।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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