नैतिक कथाएं आपके भीतर अच्छाई निर्मित करती हैं

मैं एक आयोजन के लिए इंदौर जा रहा था। जब मैंने अपना हैंड बैगेज कम भीड़ वाले एयरपोर्ट जो मुंबई में दुर्लभ ही है- में स्क्रीनिंग मशीन पर रखा तो मैंने देखा कि मशीन के लिए जिम्मेदार सीआईएसएफ कर्मी सो गया है और उसने स्कैनर से गुजरते मेरे बैग को नहीं देखा। जाहिर था कि काम का लंबा वक्त उसकी सेहत पर असर डाल रहा था। मैं उसकी महिला सुपरवाइजर के पास पहुंचा और कहा, ‘यदि आप वादा करें कि किसी को सजा नहीं देंगी बल्कि उसकी मदद करेंगी तो मैं आपको यहां सुरक्षा से जुड़े एक बड़े मसले के बारे में बताऊंगा।’ वे सहमत हो गईं और मैंने अपना अनुभव सुना दिया। वह संबंधित स्टाफ के पास पहुंचीं और उसे एक कप चाय पीने के लिए छुट्‌टी दे दी। यह जानकर कि मैं कुछ दूरी से उन्हें देख रहा होऊंगा, उन्होंने मेरी ओर ‘थंब्स अप’ का इशारा किया और इशारे से बताया कि आप जाइए, ‘मैं उस कर्मी का ख्याल रखूंगी’।
एक पत्रकार के बतौर मुझे अपने ही व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा था, क्योंकि मैं हमेशा ऐसी खोजी पत्रकारिता वाली घटनाओं पर कूद पड़ता हूं। फिर मुझे अहसास हुआ कि यह इन्फोसिस के संस्थापकों में से एक नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति द्वारा लिखी कहानी का असर है, जिसे मैंने शुक्रवार रात को पढ़ा था। कहानी कुछ इस प्रकार है….
बहुत समय पहले एक नि:स्वार्थी और धर्मनिष्ठ राजा केरल में न्यायपूर्वक राज करता था, जिसे उसकी प्रजा पूजती थी। एक रात जब राजा वेश बदलकर राज्य की व्यवस्था का निरीक्षण कर लौट रहा था तो उसने देखा कि अच्छे वस्त्र पहनी एक महिला सुनसान पड़े भगवती मंदिर के बरामदे में बैठकर रो रही है। राजा उसके पास जाकर बोला, ‘हे माता, मुझे बताइए कि किस बात ने आपको इतना दुखी कर रखा है, हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूं।’ अपने आंसू पोंछते हुए उसने कहा, ‘ओ मेरे बच्चे, मैं इस राज्य की राजलक्ष्मी हूं। मैं संपदा के साथ समृद्धि और शांति भी लाती हूं। लेकिन मेरा वक्त समाप्त हो गया है और अब मुझे जाना ही होगा। इसीलिए मैं दु:खी हूं।’ राजा ने अपनी पहचान उजागर न करते हुए पूछा, ‘आपको जाना क्यों जरूरी है’?
वह महिला कहती है, ‘जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है और इस राज्य का पतन कल से शुरू हो रहा है। इसलिए मुझे जाना होगा। हालांकि मैं जाना नहीं चाहती।’ महिला के रहस्यमय शब्दों से चिंतित होकर राजा पूछता है, ‘क्या मैं कुछ कर सकता हूं?’ महिला ने कहा, ‘केवल इस राज्य के लोग ही मदद कर सकते हैं। उन्हें कैसे भी करके मुझे यहां ठहरने के लिए मजबूर करना होगा’। राजा कुछ देर तक मौन रहा और फिर कहा, ‘ठीक है, जरा मुझे इस बारे में सोचने दीजिए। इस बीच, मैं मंदिर के भीतर जाकर देवी से प्रार्थना करना चाहता हूं कि वे हमें कोई रास्ता बताएं। उसके लिए पहले मुझे स्नान करना होगा। हे दयालु महिला क्या आप मुझ पर एक एहसान करेंगी। कृपया मेरे ये कपड़े तब तक संभालें जब तक कि मैं कुएं से बाहर नहीं आ जाता।’ महिला ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, ‘जल्दी से वापस आना, सुबह होने ही वाली है। मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।’ राजा ने एक बार फिर पूछा, ‘क्या आप मेरे लौटने तक इंतजार करने का वादा करती हैं?’ महिला ने कहा, ‘मैं हमेशा अपना वादा पूरा करती हूं। बस, जरा जल्दी लौट आना।’ राजा सीढ़ी वाले उस कुएं में उतर गया। राजा ने मुड़कर देखा कि महिला उसके कपड़े लेकर उसका इंतजार कर रही थी। राजा ने स्वयं से कहा, ‘हे देवी, मैं जानता हूं कि आप कौन हैं। यदि मेरी जान भी चली जाए तो कोई बात नहीं पर मैं आपको इस राज्य से जाने देकर अपनी प्रजा को संकट में पड़ते नहीं देख सकता। मेरे प्रजा हमेशा समृद्धि का लुत्फ उठाए और यह सुनिश्चित करना मेरा कर्तव्य है कि वह कभी तकलीफ में न आए।’
फिर राजा उस कुएं में उतर गया और खुद को पानी में डुबो दिया। महिला उसका इंतजार करती ही रह गईं। चूंकि उन्होंने राजा के लौटने तक इंतजार करने का वादा किया था, वह चुपचाप मंदिर के भीतर चली गई। तब से संपदा की देवी केरल में ही मौजूद हैं।

फंडा यह है कि बेशक, नैतिकता की कहानियां पढ़ने से हम सबमें अच्छाई का प्रवेश होता है।

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