नौकरी के इंतजार में खाली बैठना और कुछ न करना, असफल होने से ज्यादा खराब है

Management Funda by N. Raghuraman

अगर आप गूगल पर बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट से कोलकाता के बीच की दूरी देखेंगे तो यह 78 किमी दिखाएगा और वहां पहुंचने के लिए करीब तीन घंटे का समय बताएगा। लेकिन थोड़ा पहले रहने के कारण 19 वर्षीय इमरान शेख को यह दूरी 60 किमी पड़ती है। लॉकडाउन से पहले वह रोज मिठाई बेचने कोलकाता जाता था।

उसकी खासियत यह थी कि इमरान की सभी मिठाइयां सस्ती और स्वादिष्ट हैं। वह सभी मिठाईयां 5 रुपए की दर से बेचता है। मिठाइयों के लिए मशहूर नदिया के ज्यादातर मिठाईवाले कोलकाता में मिठाइयां बेचते हैं। इमरान के माता-पिता कृषि कामगार हैं और दिनभर खेत पर काम करते हैं। इमरान जैसे लोग मिठाई बेचकर अपना परिवार पालने के लिए लोकल ट्रेनों से कोलकाता जाते हैं।

राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगने के बाद लोकल ट्रेन सेवाएं बंद हो गईं और इमरान का परिवार गरीबी से संघर्ष करने लगा। इमरान मशहूर था और वह ग्राहकों के साथ अपने संपर्क नहीं खोना चाहता था। अनलॉक 1.0 की घोषणा होते ही उसने तुरंत बिजनेस दोबारा शुरू कर दिया। लेकिन समस्या यह थी कि ट्रेन नहीं चल रही थीं। उसने एक रास्ता निकाला।

वह तब से रोजाना 7-8 घंटे साइकिल चलाकर कोलकाता आना-जाना कर रहा है। वह रोज सुबह 3 बचे दो कनस्तर मिठाई लेकर निकलता है और करीब 7 बजे कोलकाता पहुंचता है। पूरी मिठाइयां बिकते ही वापस लौट आता है। इस छोटी-सी कहानी मुझे लॉकडाउन के बाद से ऑनलाइन क्लास ले रहे युवाओं से यह पूछने पर मजबूर कर रही है कि लॉकडाउन के दौरान आने-जाने का जो समय बचा, उसमें आपने क्या किया?

इस सवाल को पूछने का कारण नौकरी के लिए उन ऑनलाइन इंटरव्यूज में है, जिनमें एक बाहरी का दृष्टिकोण बताने के लिए मैं इन दिनों शामिल हो रहा हूं। ऑपरेशन मैनेजर और मालिक आवेदक से पूछ रहे हैं, ‘आपने लॉकडाउन के दौरान क्या किया?’ या ‘आप नियमित कॉलेज के दौरान और क्या करते थे? ’मुझे महसूस हुआ कि वे सिर्फ आपके अंकों के बारे में नहीं पूछ रहे हैं।

वे यह पूछ रहे हैं कि ‘आपने अपने कोर्स के काम के अलावा क्या किया?’ मैं निजी रूप से कम से कम चार युवाओं को जानता हूं, जिन्हें इसलिए नौकरी मिली क्योंकि उन्होंने एक असफल स्टार्टअप के साथ काम किया था और वे जानते थे कि अपनी वर्किंग लाइफ में क्या नहीं करना है। और रोचक बात यह है कि ये छात्र ग्रामीण क्षेत्रों से थे और उन्होंने खुद कुछ करने की पहल की थी।

इंटरव्यू में हमने उन्हें ‘जिज्ञासा’ और ‘पहल करने’ के लिए ज्यादा अंक दिए। इसलिए प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप, स्टार्टअप बनाना या उनके साथ काम करना, असफल स्टार्टअप का हिस्सा बनना जरूरी हो गया है। अगर आप ‘कुछ नहीं’ या ‘लॉकडाउन के कारण ज्यादा कुछ नहीं’ जैसे जवाब देंगे तो नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाएगी।
इंटरनेट ने सीखने के कई अवसर खोल दिए हैं। इसलिए अब छात्रों को विदेश के नामी-गिरामी कॉलेजों में और देश में मिलने वाले साधनों में बहुत अंतर नहीं रह गया। आपको बस एक लैपटॉप और डेटा कनेक्शन की जरूरत है। कुछ साल पहले ऐसा नहीं था क्योंकि कौन योग्य होगा और किस अकादमिक पृष्ठभूमि से होगा, ये तय करने के दृढ़ तरीके थे। अब यह कल की बात हो गई। खाली बैठना और कुछ न करना अब असफल होने से ज्यादा खराब है।


फंडा यह है कि आप अपनी अकादमिक कक्षा के बाहर जो भी पढ़ते हैं, वह न केवल कक्षा के अंदर की पढ़ाई जितना महत्वपूर्ण हो गया है, बल्कि वह अपना सपना पूरा करने और नौकरी पाने के लिए भी जरूरी हो गया है।

-एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

ग्रेट डील-

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