बच्चों को जितना संभव हो उतनी परीकथाएं सुनाएं, क्या पता कब कौन-सी कहानी उनके जीवन में काम आ जाए

Management Funda by N. Raghuraman

हमने ये परी कथा शायद हजारों बार सुनी होगी, जो माना जाता है कि मध्यकालीन जर्मनी के मध्य युग (1250-1500) के दौरान की है। हैंसल और ग्रेटल एक गरीब लकड़हारे के दो बच्चे थे। जब उनके देश में भुखमरी फैली तो लकड़हारे की पत्नी (मूल कहानी में बच्चों की मां लेकिन नए एडीशन में वह उनकी सौतेली मां है) ने बच्चों को जंगल में छोड़ने का फैसला लिया ताकि बच्चे अपना प्रबंध खुद करें और पति-पत्नी की भूख से मौत न हो, क्योंकि बच्चे बहुत ज्यादा खाते थे। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि हैंसल और ग्रेटल ने बेडरूम से उनकी योजना सुन ली थी।

जब उनके माता-पिता सोने चले गए तो हैंसल घर से बाहर निकला और उसने जितने संभव हो, उतने सफेद कंकड़ इकट्‌ठा कर लिए। फिर कमरे में लौटकर उसने ग्रेटल को दिलासा दिया कि ईश्वर उनका साथ नहीं छोड़ेगा।

अगले दिन परिवार घने जंगलों के लिए निकला और हैंसल पगडंडी पर सफेद कंकड़ छोड़ता चला गया। जब उनके माता-पिता उन्हें छोड़कर चले गए तो बच्चे कंकड़ों की निशानियों का पीछा करते हुए सुरक्षित घर आ गए। उनकी सौतेली मां इससे आगबबूला हो गई।

अब सीधे आते हैं 2020 की आधुनिक कहानी पर। बेंगलुरु में 50 वर्षीय एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग कंसल्टेंट भोला राजा का मुन्ना नाम का एक देसी पालतू कुत्ता था। मुन्ना जब पिल्ला था, तब से ही उसे बांधा जाना पसंद नहीं था। वह पड़ोस की ही एक और देसी पालतू भाजी के काफी करीब था। बीती 25 अक्टूबर को मुन्ना को मिर्गी का दौरा पड़ा और राजा उसे ऑटो रिक्शा में जानवरों के अस्पताल ले गए, जहां उसे भर्ती किया गया। उस दिन से मुन्ना की दोस्त भाजी हर ऑटो रिक्शा के पीछे दौड़कर भौंकने लगी, यह देखने के लिए कि क्या उसमें मुन्ना है।

अस्पताल में दो दिन रहने के बाद मुन्ना बाउंड्री फांदकर भाग गया। जब अस्पताल ने राजा को कुत्ते के बारे में बताया, वे अपनी गाड़ी से आस-पास घूमकर लोगों से पूछने लगे कि क्या उन्होंने मुन्ना को देखा है। उन्होंने फैम्फलेट लगाए और इनाम तक की घोषणा की। आखिरकार उनका अपने पालतू से 6 वर्षों का रिश्ता था। चार दिन तक राजा ने 400 किमी ड्राइविंग कर एनिमनल शेल्टर और आस-पास के सभी इलाकों में मुन्ना को तलाशा।

मुन्ना को तलाशते हुए राजा की दोस्ती एक ऑटो ड्राइवर बसावप्पा से हो गई। बसावप्पा ने सलाह दी कि जिस कपड़े पर मुन्ना सोता था, उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर घर की ओर आने वाले रास्तों पर डालते जाएं। फिर 29 अक्टूबर को राजा ने घर से अस्पताल के बीच के 15 किमी के रास्ते पर हर 100 मीटर की दूरी पर मुन्ना के पसंदीदा कंबल के टुकड़े डाल दिए। चौराहों-तिराहों पर उन्होंने एक से ज्यादा टुकड़े गिराए, ताकि मुन्ना को सूंघकर सही दिशा में जाने में आसानी हो। इस बीच उन्होंने मुन्ना को ढूंढना भी जारी रखा।

फिर 30 अक्टूबर को रात करीब 10 बजे राजा ने जानी-पहचानी भौंक सुनी। उन्होंने बाहर देखा तो यह मुन्ना था जो तेजी से पूंछ हिला रहा था और घर का रास्ता ढूंढने और अपने माता-पिता से मिलने पर उत्साहित था। खुश राजा ने कुत्ते की जांच की। उसे कोई चोट नहीं थी, इंफेक्शन ठीक हो गया था लेकिन वह बहुत थका हुआ था। भरपेट खिलाने के बाद राजा उसे उसकी दोस्त भाजी के पास ले गए। भाजी और मुन्ना अब खुशी-खुशी रह रहे हैं।

फंडा यह है कि बच्चों को जितना संभव हो उतनी परीकथाएं सुनाएं। क्या पता कब कौन-सी कहानी उनके जीवन में काम आ जाए।

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