पारिवारिक लगाव ही जीवन को पूर्ण व खुशनुमा बनाता है

मु झे हमेशा उन लोगों के प्रति सहानुभूति रहती है, जिन्हें अपने कामकाज के सिलसिले में परिवार को छोड़कर मीलों लंबी यात्रा करनी पड़ती है। मैंने अपनी विवाह पूर्व की और वैवाहिक जिंदगी में परिवार के सदस्यों से दूर रहने के पलों को अनुभव किया है, जब मेरा काम मुझे उनसे दूर ले गया है। दिल घर के प्रेम के लिए तरस जाता है, जबान चिरपरिचित स्वाद की कामना करती है, क्योंकि मन बार-बार घर पर मां के बनाए पोहे या उपमा की याद दिलाता रहता है और चिक्की या चाकलेट या टी-शर्ट को लेकर भाई-बहनों में होने वाले छोटे-मोटे झगड़ों को टीवी के रिप्ले की तरह दिखाता रहता है। यह सूची अंतहीन है। साप्ताहिक छुट्‌टयों पर तो हालत और भी खराब हो जाती है। आप कोई मूवी देखकर या नई जगहों की सैर करके खुद पर पैसा खर्च करना नहीं चाहते बल्कि बचत करके वह थोड़ा-सा पैसा अपने भाई-बहनों के लिए भेजना चाहते हैं। फिर आपको समझ में नहीं आता कि छुट्‌टी के दिन करें क्या। अकेलापन आपको खाने को दौड़ता है। जब पड़ोसी कहता था कि आपके लिए फोन कॉल है तो न जाने किस अजीब-सी वजह से दिल की धड़कन बढ़ जाती और ओंठों से प्रार्थना के शब्द निकलने लगते। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि घर से दूर जाकर कमाने वाले अविवाहित लोग बहुत शिद्दत से दुआ मांगते हैं।
यही वजह है कि मुझे यह युवा बहुत अच्छा लगता है, जिसके पिता कबाड़ी थे और मां निर्माण स्थलों पर मजदूरी करती थीं तो इस कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि ने उसे 8वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया ताकि वह कोई कामकाज करके परिवार की मदद कर सके। भाग्य ने उसकी कड़ी परीक्षा लेनी शुरू कर दी। 2009 में जब पिता को लास्ट स्टैज का कैंसर होने का पता चला तो उसी वक्त उसकी चार में से दो बहनें भी बीमार पड़ गईं। उन्होंने घर में जो कुछ था सब बेच दिया पर इसके बावजूद पिता को नहीं बचा सके और वे सितंबर 2009 में चल बसे। 2010 में उससे दो साल बड़ी बहन भी गुजर गई। उसकी आहारनली में इन्फेक्शन हो गया था और वह पूरे शरीर में फैल गया। सरकारी अस्पतालों के चक्कर बढ़ गए थे। परिवार के पास उसके इलाज के लिए पैसा नहीं था। हालांकि, उसकी मां कोई भी जिम्मेदारी अकेले नहीं संभाल सकती थीं फिर भी उसने कमाई के लिए ‘टपरी’ खोल ली और इस युवक से कहा कि वह अपने सपने पूरे करने के लिए घर से मीलों दूर जाने में कोई संकोच न करें।
आप जानते हैं उसका सपना क्या था? एक एक्टर बनना, जो उसके परिवार की हालत देखते हुए मेल नहीं खाता था! लेकिन, उसने बड़ा सपना देखा और मुंबई चला गया। शुरू में तो उसके पास इतना भी पैसा नहीं था कि वह शूटिंग सेट्स पर जाकर काम मांग सके। वह मां को फोन कॉल लगाकर ऐसी हर यात्रा के लिए 150 रुपए की मांग करता था। 2010 में जब उसे कुछ विज्ञापन फिल्में मिलने लगीं तो शेष तीन बहनों में से एक की हालत खराब हो गई। वह उसे देखने जल्दी से दिल्ली पहुंचा। बहन को जिंदगी में सिर्फ एक सुकून चाहिए था और वह यह था कि वह किसी गद्दे पर सो सके, क्योंकि फर्श पर सोने से उसे सबसे ज्यादा तकलीफ हो रही थी। उसने वादा किया कि वह उसकी यह तकलीफ दूर करेगा पर वह इसका लुत्फ लेने का इंतजार नहीं कर सकी और उसकी मौत हो गई।
2013 में माना जा रहा था कि एक बड़ा डायरेक्टर उसे लॉन्च करने वाला है। हालांकि, दो साल के इंतजार के बाद प्रोजेक्ट रद्द हो गया और उसके साथ परिवार के लिए मकान खरीदने का उसका सपना भी खारिज हो गया। 2017 में उसकी सबसे बड़ी बहन किडनी खराब हो जाने से गुजर गई और हाल ही में 1 अगस्त 2019 को उसके भाई की दिल के दौरे से मौत हो गई। आज उसके पास सबकुछ है और दिल्ली में बड़ा मकान होने के बावजूद वह अपने कुत्ते सहित पूरे परिवार को मुंबई ले जाने की योजना बना रहा है तो, याद रहें कि कहीं न कहीं यह कसक तकलीफ देते है कि पूरा परिवार उसकी सफलता का लुत्फ नहीं उठा सका। मिलिए 31 वर्षीय अंश बागड़ी से, जो टीवी सीरियल ‘दिल तो हैप्पी है जी!’ के प्रमुख पुरुष पात्र का किरदार निभा रहे हैं।
फंडा यह है कि बड़े सपने देखें, उन्हें हासिल करें और यदि आपके पैरेंट्स और बहन-भाई आपके आसपास हंै तो आप सबसे भाग्यवान हैं, इसलिए जितना हो सके उनसे नजदीकी बनाएं और रोज कहते रहें कि आप उनसे प्यार करते हैं- इससे जीवन में पूर्णता आती है और दिल होता हैप्पी है!

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