पुराने दिनों की कई अच्छी चीजें नए दौर में में गौरव बढ़ा सकती है, लेकिन इसके लिए टेक्नोलॉजी से भरपूर एक धक्का लगाने की जरूरत है

“हम चांद पर इंसान को भेज चुके हैं, और तुम अब तक अपने खेत में गाय का गोबर इस्तेमाल करते हो? “एक सूट-बूट वाला आदमी बड़े ही अपमानजनक लहजे में एक किसान पर कटाक्ष करता है और उसके आसपास जमा लोग किसान पर हंसते हैं। वे सभी उस आदमी की तरफ ऐसे देखते हैं जैसे कि ईश्वर ने कोई फरिश्ता भेजा है जो उनकी उन्नति के लिए कोई बहुत महान काम करेगा।

मैंने सेवाग्राम और बूटी बोरी के आसपास के खेतों में, ऐसी घटना स्वयं अपनी आंखों से देखी है, जहां महात्मा गांधी और विनोबा भावे जैसी दो महान शख्सियतों के आश्रम हैं और उनकी शिक्षाओं में विश्वास करने वाले ऐसे सैकड़ों लोग रहते हैं जो अपने जीवन को बेहद सरल तरीके या कहें कि ज्यादा जैविक (ऑर्गनिक) तरीके से जी रहे हैं। लेकिन इन अपमानजनक शब्दों ने किसानों और उनकी कई पीढ़ियों के मन को बदलकर रख दिया, जिन्होंने खेती के लिए अत्यधिक रसायन इस्तेमाल किए और हम सभी जानते हैं कि इस अंधाधुंध प्रयोग का आखिरकार हमारे ऊपर क्या असर हुआ! आज हममें से अधिकांश लोग गाय के उसी गोबर की और लौट रहे हैं और बाकी चीजें अपना रहे हैं, जिनकी ब्रांडिंग जैविक खाद से नाम की जा रही है। मैं भी इस बदलाव का एक शिकार बना हूं। जब लोग कॉलेज में साइकिल चलाने पर मुझे चिढ़ाते थे, तो मैंने कड़ी मेहनत करके अपना पहला मोटरचलित वाहन ‘लूना’ खरीदा और उसके बाद प्रतिस्पर्धा में दोस्तों और पड़ोसियों को पीछे छोड़ने के चक्कर में महंगी कारें खरीदने के लिए प्रेरित हुआ। यही वजह थी कि सोमवार को जब मैंने साइकिलों से काम पर जाते उन चार प्रतिशत पुणेकरों (पुणे के लोग) को देखा, जिनमें अधिकांश युवा थे, तो मैं यह सोचकर हैरान था कि ऐसी क्या बात है कि ये लोग किसी के चिढ़ाने का शिकार बनकर भौतिकता के चक्कर में नहीं पड़े? पुणे में चारों तरफ जहां नज़र जाए वहां हरे, नारंगी, नीले और कई अन्य चटख रंगों की साइकिलें दिख रही हैं और पुणे के साइक्लिंग के लिए प्यार को फिर से ज़िंदा करने में मददगार बन रही हैं।


यहां सेवाएं दे रहीं ज्यादातर साइकिल कंपनियों के ग्राहक 18 से 25 वर्ष की उम्र के हैं। चार प्रमुख कंपनियों में से हर एक में 500 से 1000 नए यूजर्स रोज रजिस्ट्रेशन करा रहे हैं और इनमें से 10 प्रतिशत पक्के ग्राहक बन रहे हैं। पुणेकर हर चक्कर में 25 मिनट के औसत साइक्लिंग टाइम के साथ करीब चार लाख चक्कर लगा रहे हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे में सामने आया कि साइकिल का ज्यादातर उपयोग फिटनेस, सैर-सपाटा, ट्यूशन और आसपास की जरूरी चीजों की दुकानों तक आने-जाने में हो रहा है। यहां के नगरीय निकाय में साइकिल विभाग भी बना है और इसके प्रमुख नरेंद्र सालुंके का लक्ष्य पुणेकरों के लिए कुल 80 किलोमीटर का साइकिल ट्रैक बनाने का है और इसके अलावा स्टैंड, पोर्ट और आने-जाने की सुविधा के लिए ट्रैक्स का बुनियादी ढांचा होगा। परिवहन के इस मोड में एक नया सदस्य और जुड़ा है जिसका नाम है “पॉज़-अ-राइड।” यह एक ऐसी सुविधा है जिसमें एक ही साइकिल से कई चक्कर लगाए जा सकते हैं, और साइकिल पर लगा जीपीएस जब साइकिल खड़ी होगी तो उसका उसके ठहराव वाले समय की मॉनिटरिंग करता है। इसका मतलब है कि आपको सिर्फ साइकिल चलाने के समय के हिसाब से भुगतान करना होगा और जितनी देर साइकिल खड़ी रही उसका कोई पैसा नहीं लगेगा। अब विभाग का ध्यान साइकिल ट्रैक के रास्ते से हर तरह के अतिक्रमण हटाने पर है ताकि लगातार बढ़ रहे साइकिल चलाने वालों को सुरक्षित रास्ता मिल सके।

अभी यहां साइकिल चलाने के लिए रास्ता 3 से 10 किमी की दूरी में सिमटा हुआ है। लेकिन यह छोटी सी शुरुआत और हर दिन बढ़ रही युवाओं की भागीदारी ट्रैफिक के दबाव और कार्बन उत्सर्जन को कम करके पूरे शहर की सेहत को ठीक करने में प्रशंसनीय भूमिका निभा रही है। पुणे के युवाओं को अब एक नया फैशन स्टैंटमेंट बोलते देखा जा सकता है, “ओह, जब मैं काम के लिए जाता/जाती हूं तो मुझे अपने पीछे कार्बन फुट प्रिंट छोड़ना पसंद नहीं’ । इसका मतलब है कि वह लड़का/लड़की आने-जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करता/करती है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पुराने दिनों में सबकुछ अच्छा था और नए जमाने में सबकुछ खराब है या उन दिनों में सबकुछ खराब था और अब टेक्नोलॉजी के कारण अब सबकुछ अच्छा है। लेकिन नि:संदेह दोनों ही दौर में कुछ अच्छी आदतें रही हैं जिन्हें मानव जाति के समग्र फायदे के लिए गले लगाया जाना और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


फंडा यह है कि पुराने दिनों में प्रचलित रहीं कई अच्छी चीजें अगर नए दौर में अपना अस्तित्व बनाए रख सकती हैं तो उन्हें फिर से अपनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए गर्व, जागरूकता और टेक्नोलॉजी से भरपूर एक धक्का लगाने की जरूरत है।

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