पेशेवर रूप से मानवीय रहना, सिर्फ पेशेवर या केवल मानवीय रहने से कहीं ज्यादा बेहतर है

बीती 14 अगस्त को एक बुजुर्ग और उनके बिजनेसमैन बेटे और बहू को पुणे में कोविड-19 केयर सेंटर में भर्ती किया गया। इस सोमवार रात को बुजुर्ग की तबीयत ठीक नहीं थी। डॉ राज पुरोहित और डॉ महेंद्र केवड़िया कोविड पॉजीटिव मरीजों को देख रहे थे। सहयोग के लिए डॉ रंजीत निकम भी थे। रात के 2.30 बजे थे। अचानक बुजुर्ग को सांस लेने में तकलीफ होने लगी, पर वहां उन्हें आईसीयू वाले अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं था। एक एम्बुलेंस ड्राइवर को बुखार था।

सेंटर के स्टाफ ने दूसरा ड्राइवर बुलाने की कोशिश की लेकिन उसका फोन नहीं लगा। मरीज की हालत बिगड़ रही थी और उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत थी। स्टाफ ने 108 पर बात करने की कोशिश की लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिली। यह पहली बार था जब सेंटर में ऐसी स्थिति आई थी। तब डॉ रंजीत निकम ने अपनी भूमिका बदली और एक मेडीकल प्रैक्टिशनर से एम्बुलेंस ड्राइवर बन गए। डॉ निकम के पास होमियोपैथिक मेडीसिन एंड सर्जरी की बैचलर डिग्री है।

महामारी के बाद से वे समाजसेवा कर रहे हैं। वे एक महीने पहले कोविड पॉजीटिव हुए थे और ठीक होने के बाद फिर मरीजों के लिए काम करने लगे। जब उन्होंने एम्बुलेंस चलाने का फैसला लिया तो डॉ पुरोहित भी उनके साथ हो लिए ताकि रास्ते में परेशानी न हो। फिर डाक्टरों का दु:स्वप्न शुरू हुआ। लगभग तीन अस्पतालों में आईसीयू बेड नहीं मिले। चार घंटे ड्राइविंग के बाद, अपने निजी कॉन्टैक्ट्स का इस्तेमाल कर अंतत: उन्हें सुरक्षित जगह मिली, जहां बुधवार को बुजुर्ग की स्थिति में सुधार हुआ। किसी तरह जान बचाने का प्रयास करने की उनकी प्रतिबद्धता सफल रही।

इस घटना से मुझे दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन के अशिक्षित सर्जन हैमिलटन नाकी की कहानी याद आई, जिन्हें मास्टर ऑफ मेडीसिन की मानद डिग्री दी गई थी। कुछ लोग कहते हैं कि वे कभी स्कूल नहीं गए, जबकि कुछ कहते हैं कि उन्होंने छठवीं तक पढ़ाई की। हालांकि उन्होंने कभी मेडीसिन की पढ़ाई नहीं की। हैमिलटन के माता-पिता चरवाहे थे। वे केपटाउन मेडीकल यूनिवर्सिटी जाकर बतौर मजदूर काम करने लगे। वे चिकित्सा विज्ञान में उस स्तर पर पहुंचे जहां कोई कभी नहीं पहुंचा।

एक दिन प्रोफेसर रॉबर्ट जॉयस जिराफ पर अध्ययन कर देखना चाहते थे कि जब वह पानी पीने के लिए गर्दन झुकाता है तो उसे दिमागी झटका (सीज़र) क्यों नहीं लगता। उन्होंने जिराफ को ऑपरेशन टेबल पर लिटाया और उसे पकड़ने के लिए हैमिलटन को बुलाया। उनकी 8 घंटे की मदद ने उन्हें लैब असिस्टेंट बना दिया। यहां से उन्होंने सर्जरी के बाद टांके लगाने में डॉक्टरों की मदद करना शुरू किया। फिर उन्होंने जूनियर डॉक्टरों को सर्जरी की तकनीकें पढ़ाना शुरू कर दिया। वे धीरे-धीरे विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण शख्सियत बन गए। वे चिकित्सा विज्ञान के शब्दों से अन‌भिज्ञ थे। लेकिन वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सर्जन थे। उन्होंने दुनिया की पहली हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी में भी भाग लिया।

जब 1970 में लीवर पर शोध शुरू हुआ तो उन्होंने सर्जरी के दौरान लीवर की ऐसी नस पहचानी, जिससे उसका ट्रांसप्लानटेशन आसान हुआ। वे चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में पहले अशिक्षित शिक्षक और 30 हजार सर्जनों को प्रशिक्षण देने वाले अशिक्षित सर्जन थे। हैमिलटन 2005 में गुजर गए और उन्हें विश्वविद्यालय में ही दफनाया गया। वे ये सभी चीजें हासिल कर पाए क्योंकि वे मानवता के लिए प्रतिबद्ध थे।

फंडा यह है कि पेशेवर रूप से मानवीय रहना, सिर्फ पेशेवर या केवल मानवीय रहने से कहीं ज्यादा बेहतर है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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