पैरेंटिंग बच्चों को चारदीवारी और घर के बाहर जाने में सही अनुपात बनाए रखने की कला है, ताकि नई पीढ़ी का सर्वांगीण विकास हो सके

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

अगर आप ऐसे पैरेंट हैं, जो सोचते हैं कि बाहर कोरोना के संपर्क में आने से अच्छा है कि बच्चे मोबाइल पर गेम खेलते रहें और अपनी ऑनलाइन शॉपिंग के लिए बच्चे का तकनीकी ज्ञान देखकर गर्व महसूस करते हैं, तो यह घटना सिर्फ आपके लिए है, इसमें ज़िंदगी के दोनों पक्ष हैं। यह कहानी बताती है कि कैसे मासूम बच्चे उन चीजों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जिनकी तरफ उन्हें नहीं होना चाहिए। और अगर ऐसा होता है, तो पैरेंट्स को कैसा संजीदा व्यवहार करना चाहिए!

वह सिर्फ 12 साल का ग्रामीण बच्चा है, जिसकी मासूमियत उसके हमउम्र शहर के बच्चों से कुछ ज्यादा है। तमिलनाडु में मदुरै के निकट रहने वाले इस परिवार में बच्चे की मां ऑनलाइन चीजें मंगाने में हमेशा बच्चे की मदद लेती थीं। वह लड़का, जिसने कक्षा सातवीं पूरी की थी, ऑनलाइन भुगतान करना सीख गया था। कुछ समय में ही उसने कार्ड नंबर से लेकर पासवर्ड तक सबकुछ याद कर लिया। और बाकी समय वह अपनी मां के मोबाइल पर गेम खेलता रहता। अन्य मांओं की तरह, वह भी सोचतीं कि बाहर वायरस के संपर्क में आने से अच्छा है कि वह मोबाइल पर गेम खेलता रहे।

पर उन्हें इस बात की भनक भी नहीं थी कि बच्चे ने इन तीन महीनों में ऑनलाइन गेम्स खेलने के लिए उनके खाते में से बचत के 97 हजार रुपयों में से 90 हजार खर्च कर दिए हैं! चूंकि उसे सारे नंबर्स पता थे इसलिए उसकी राह में कोई रुकावट नहीं थी। हर बार खर्च करने के बाद बैंक से आने वाले मैसेज भी उसने डिलीट कर दिए, ताकि किसी को पता ना चले। इस बात का तब पता चला जब मां हाल ही में एटीएम से पैसे निकालने के लिए गईं।

पर, जिस तरीके से बच्चे के पिता सेंथिल कुमार ने परिस्थिति को संभाला, उसने मुझे प्रभावित किया। इतनी बड़ी राशि गंवाने पर उन्होंने बच्चे की पिटाई नहीं की। बल्कि, उन्होंने उसकी ऑनलाइन गेम्स की लत छुड़ाने की कोशिश की। शुरुआत में उनके प्रयासों का कोई खास फल नहीं मिला, पर पिता ने छोटी एक्सरसाइज करवाना जारी रखीं।

गलती की सजा के तौर पर उन्होंने बेटे को 1 से लेकर 90 हजार तक अंक लिखने के लिए कहा। बच्चे ने लिखना शुरू किया और पांच दिन में बमुश्किल 3,500 अंक पार कर उसे लगा कि यह बहुत कठिन काम है। और तब उसने पिता को कहा कि इसके बदले वह मोबाइल गेम्स की लत छोड़ने को तैयार है। इस बीच यह घटना गांव में जंगल मंे आग की तरह फैल गई और गांव के बुजुर्गों को जागरुकता मुहिम चलाने के लिए प्रेरित किया।

अगर आप सोच रहे हैं कि विशेष तौर पर संक्रमण के इस दौर में बच्चों को घर से बाहर कैसे व्यस्त रखा जाए, तो यह उदाहरण आपके लिए है। बेंगलुरु के कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एमबीए विभाग के 82 छात्रों ने तय किया कि जब शहर संकट से गुजर रहा है, ऐसे में वे घर पर नहीं बैठ सकते। सफाई, काउंसिलिंग, जागरुकता कार्यक्रम, बुजुर्गों-अनाथों और रहवासियों की मदद- ऐसा बहुत कुछ वे कर सकते थे और ऐसा ही उन्होंने किया।

चूंकि इस समय बाहरी लोगों से बात करने में लोग डर रहे हैं, ऐसे में इन छात्रों ने पढ़ाने की प्रक्रिया को अनुकूल बनाने के लिए सरकारी स्कूल में वर्कबुक्स बनाने के लिए वर्चुअल एक्सरसाइज विकसित की।

इन सामाजिक प्रभाव के प्रोजेक्ट्स ने छात्रों को लीडरशिप स्किल, निर्णय लेने और समस्या का समाधान निकालने का हुनर सिखा दिया, जो कि एक सफल मैनेजमेंट प्रोफेशनल बनने के लिए जरूरी है। फंडा यह है कि पैरेंटिंग बच्चों को चारदीवारी और घर के बाहर जाने में सही अनुपात बनाए रखने की कला है, ताकि नई पीढ़ी का सर्वांगीण विकास हो सके।

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