प्रेम की गुणवत्ता इस दुनिया की किसी भी चीज को परास्त कर सकती है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस हफ्ते मेरी एक फ्लाइट के दौरान, एक दो वर्षीय बच्ची बिजनेस क्लास में अपनी मां की गोद में बैठी थी। एविएशन की भाषा में ये शिशु कहलाते हैं और इन्हें सीट नहीं मिलती। जब उसकी मां को उसका और बच्ची का खाना परोसा गया, बच्ची बर्तनों से खेलती रही लेकिन कुछ भी खाने से इनकार कर दिया। वह दौड़कर पीछे वाली रो (पंक्ति) में चली गई क्योंकि उसकी देखभाल करने वाली आया बैठी थी।

बच्ची ने खुशी-खुशी अपना खाना खाया, जो कि बिजनेस क्लास के खाने से अलग था। बहुत मनाने पर भी बच्ची का ध्यान वहां से नहीं हटा। जब बच्चों के लिए तैयार खाना पीछे वाली रो में परोसा गया, बच्ची ने उसे खा लिया क्योंकि उसकी आया खिला रही थी। जब मैं बच्ची के फैसले पर मुस्कुरा रहा था, मां ने सफाई दी कि बच्ची का आया से ज्यादा लगाव है। दरअसल, मां एक फिल्म उद्योग पेशेवर हैं और बच्ची की हर जरूरत पर ध्यान देने का उन्हें वक्त नहीं मिलता है।

मैं उनसे असहमत हुआ और कहा कि यह मायने नहीं रखता कि कितना समय दिया, बल्कि लगाव की गुणवत्ता मायने रखती है, क्योंकि यह हमारी संवेदनाओं के प्रेरकों से जुड़ी है, जो शिशु की समझ और भावनात्मक विकास के लिए दिमाग को व्यवस्थित करते हैं। उनके चेहरे पर सवाल दिख रहा था।

इसलिए मैंने यह साबित करने के लिए वैज्ञानिक सिद्धांत की मदद ली कि गुणवत्तापूर्ण देखभाल शिशु के दिमागी क्रियाकलाप और व्यवहारिक अभिव्यक्ति विनियमित करती है और लंबी अवधि के भावनात्मक नियमन को सुनिश्चित करती है। मैंने अपने सिद्धांत को गदाधर की कहानी से और मजबूत दी, जो बाद में रामकृष्ण परमहंस के नाम से मशहूर हुए। सोशल मीडिया पर उनकी कहानी कुछ इस तरह है।

धन्या छोटी जाति की 50 वर्षीय दयालु महिला थी। इस गरीब दाई ने एक महिला की लड़के को जन्म देते समय प्रसव में मदद की थी। उस दिन से ही दाई को इस बच्चे से अनकहा भावनात्मक लगाव हो गया। पांच साल बाद बच्चे के उपनयनम संस्कार का फैसला लिया गया। ‘मातृ भिक्षा’ उपनयनम की जरूरी अंतिम प्रथा है, जिसमें बच्चे को अपनी मां से पहली भिक्षा (एक कटोरा चावल) और पहला आशीर्वाद मिलता है।

हर मां इस कार्यक्रम में गौरवान्वित महसूस करती है। बच्चा यह भिक्षा धन्या से लेना चाहता था क्योंकि उसने धन्या से वादा किया था, लेकिन उसके बड़े भाई ने ऐसा न करने की चेतावनी दी। मुहूर्त के दिन कार्यक्रम अच्छे से हो रहा था। फिर ‘मातृ भिक्षा’ का समय आया। बच्चे की मां और अन्य महिलाएं भिक्षा देने को तैयार थीं।

लेकन बच्चा हाथ में छोटी झोली लिए धन्या की तरफ बढ़ा, जो दूर कोने में इस प्यारे बच्चों को देने के लिए हाथ में चावल और फल लिए खड़ी थी। यहां सारे ब्राह्मण पंडित देखते रह गए और सभी महिलाएं भौंचक्की खड़ी रहीं, वहां बच्चा धन्या के सामने दंडवत हो गया और एक छोटी जाति की महिला से अपनी पहली भिक्षा ली, वह भी तब, जब छुआछूत अपने चरम पर थी।

आंखों में आंसू लिए धन्या ने बच्चे को आशीर्वाद दिया। सबको इस घटना पर हंगामे की आशंका थी, वहीं मुख्य पंडित ने बच्चे की ‘सत्य वाक परिपालनम’ की सराहना की और उसे हृदय से आशीर्वाद दिया। यह यादगार शांत क्रांति पश्चिम बंगाल के छोटे से गांव में दशकों पहले हुई थी। शायद गरीब महिला से निकले अंतरंग प्रेम और लगाव के इस बीज से ही महान रामकृष्ण मठ का आधार बना, जो सभी जाति, संप्रदाय और धर्मों से परे है। फंडा यह है कि प्रेम की गुणवत्ता इस दुनिया की किसी भी चीज को परास्त कर सकती है।

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