बच्चे की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि वह खुद से कैसे बड़ा हुआ है या उसके पैरेंट्स ने उसे कैसे बड़ा किया है

इस सोमवार को मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट गुरुग्राम में स्ट्रेटजी के प्रोफेसर डॉ. राजेश के पिलानिया की बनाई देश की पहली वार्षिक हैप्पीनेस इंडेक्स रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार अगर आप इस निराशावादी समय में खुशियों की तलाश कर रहे हैं, तो मिजोरम वह जगह है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की हैप्पीनेस रैंकिंग में मिजोरम, पंजाब और अंडमान और निकोबार द्वीप टॉप 3 में शामिल हैं।

बड़े राज्यों में पंजाब, गुजरात और तेलंगाना टॉप 3 में, वहीं छोटे राज्यों में मिजोरम, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सूची में टॉप पर हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में टॉप 3 में अंडमान, पुडुचेरी और लक्षद्वीप हैं। परिणाम बताते हैं कि वैवाहिक स्तर, आयु, शिक्षा और आय के स्तर का खुशियों से सीधा संबंध है और विवाहित लोग अविवाहितों की तुलना में ज्यादा खुश हैं। इस अध्ययन में ये कसौटियां परखी गईं, जिसमें काम और इससे संबंधित मुद्दे जैसे आय, परिवार और दोस्तों के साथ रिश्ते, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक सरोकारों के साथ परोपकार, धार्मिक और आध्यात्मिक रुझान व कोविड-19 का खुशियों पर प्रभाव देखा गया।

ये रिपोर्ट मुझे मेरे बचपन में ले गई, जब बच्चे खुद से बड़े हो जाते थे और पैरेंट्स कभी दावा नहीं करते थे कि वे हमें पाल रहे हैं! माता-पिता के लिए जरूरत और सपने हमेशा बहस का मुद्दा रहे। बच्चों के पालन-पोषण में तीन वक्त का खाना, अच्छी शिक्षा और पहनने के लिए अच्छे कपड़े देना उनका उद्देश्य रहा और उन्होंने कभी बच्चे के यूएसए जाने के सपने नहीं देखे ना ही कभी ये विचार आया कि छुटि्टयों में उन्हें घुमाने के लिए ताजमहल तक ले जाएं।

उन्होंने हमें पड़ोसियों-रिश्तेदारों के साथ बगीचे, चिड़ियाघर, पार्क, सर्कस जाने की इजाजत दी क्योंकि इसमें या तो बिल्कुल पैसा नहीं लगता था या फिर ‘मैरी गो-राउंड’ जैसे झूले के लिए 3 पैसे में काम हो जाता था! संभव है कि आज के बच्चों ने वो सिक्के भी नहीं देखे होंगे! हमारा दिन इस सबके इर्द-गिर्द होता था कि किसी एक चीज का हम कितनी देर लुत्फ़ उठा पा रहे हैं, बजाय इसके कि उसका दाम क्या है। हम जहां भी गए, वह जगह उतनी महत्वपूर्ण नहीं रहीं बल्कि उस जगह हमने जो किया, उसने हमें खुशी दी।

उस वक्त कोई फोन नहीं था और तब भी बच्चों के देर से घर आने पर पैरेंट्स घबराते नहीं थे। यहां तक कि मेरे देर से आने पर जब पिता परेशान हो जाते थे, तो मेरी मां कहतीं कि ‘उसे कुछ नहीं होगा, भगवान हमेशा उसकी रक्षा करेंगे और वैसे भी वह आपकी रेलवे ट्रेन तो है नहीं, जो हमेशा समय पर रिपोर्ट करेगी!’ और तब मुझे अहसास हुआ कि बतौर पैरेंट्स उन्होंने मुझे मेरी दिनचर्या के हिसाब से मेरे समय को गुजारने की इजाजत दी।

और शायद यही एक कारण है कि मुझे मेरा अधिकांश बचपन और उम्र के साथ बढ़ने की चीज़ें याद हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में असिस्टेंट प्रोफेसर और टाइम, मनी और हैप्पीनेस के अग्रणी शोधकर्ता डॉ. एशले विलन्स इस बात पर जोर देते हैं कि जो पैसों से ज्यादा समय की कद्र करते हैं, वे अच्छी जिंदगी गुजारते हैं।

मिजोरम, पंजाब और अंडमान-निकोबार द्वीप के बारे में मैंने वही चीज़ देखी है कि यहां के लोग अपने पास मौजूद समय का आनंद उठाते हैं और मेट्रो शहरों की तरह चूहा दौड़ में नहीं भागते। फंडा यह है कि बच्चे की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि वह खुद से कैसे बड़ा हुआ है या उसके पैरेंट्स ने उसे कैसे बड़ा किया है!

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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