बच्चे क्या देखते हैं ‘डिजिटल स्क्रीन’ या ‘लाइफ स्क्रीन’?

बुधवार की सुबह तक वह 11 महीने की बच्ची मीडिया में छाई हुई थी, जबकि उसकी मां की ओर ज्यादा ध्यान नहीं गया था। पिछले दिनों नई दिल्ली में जिक्रा नाम की इस बच्ची को पलंग से गिरने के बाद हुए फ्रैक्चर के कारण लोक नायक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, लेकिन वह इलाज के लिए तैयार नहीं थी। तभी उसकी मां को आइडिया आया कि क्यों न उसकी बेस्ट फ्रेंड की मदद ली जाए! दिलचस्प यह था कि यह बेस्ट फ्रेंड एक गुड़िया थी और मां ने कहा कि आप उसका उपचार भी मेरी बेटी की तरह कीजिए। डॉक्टर ने सलाह मानी और जब जिक्रा ने अपनी प्यारी गुड़िया को बेड पर अपनी बगल में देखा, तो उसने भी उपचार लेना शुरू किया और इस मंगलवार को जब उसे डिस्चार्ज किया गया तो वह और उसकी गुड़िया दोनों के पैरों पर प्लास्टर चढ़ा था। इलाज करने वाले डॉ. अजय गुप्ता ने सही समय पर कारगर आइडिया देने के लिए बच्ची की मां की खूब तारीफ की।
बुधवार को मैं नासिक में था और उस बच्ची के अस्पताल से घर जाने की खबर पढ़ने के बाद जब सुबह की सैर पर निकला तो रास्ते में एक जगह कुछ माताओं का बदला हुआ ‘अवतार’ देखा। शोरगुल से भरी इस जगह पर स्कूल की बसें आकर रुकती हैं। वहां खड़ी माताएं एक-दूसरे से ऊंचे स्वर में बातचीत कर रही थीं, जबकि बच्चे जोर से चिल्ला रहे थे। वहां लोगों ने मेरा ध्यान इसलिए खींचा, क्योंकि उनके हाथों में स्मार्टफोन नहीं थे, साथ ही एक और दृश्य ने मेरा मन मोह लिया, जिसमें एक बच्ची हाथ में ऊन का गोला लिए खड़ी थी और उसकी गर्भवती मां सलाइयां पकड़े बुनाई कर रही थी। स्कूल जाने के लिए तैयार वह ऊन का गोला थामे खुश थीं और अपने आने वाले भाई या बहन के लिए स्वेटर बुन रही मां के काम को बड़े ध्यान से देख रही थी। बीच-बीच में मां बच्ची को बुनाई के बारे में बता रही थी, ‘देखो इसे ऐसे करते हैं’। एक अन्य महिला कुछ नए आइडिया दे रही थी और वहां खड़े उसके बच्चे भी यह देखकर रोमांचित थे कि एक नन्हा-सा स्वेटर कैसे आकार लेता है! उस बस स्टॉप पर पहले की तुलना में ज्यादा मासूमियत भरी खुशियां थीं, जो मैंने इससे पहले वहां नहीं देखी थी।
इससे पहले वहां माताएं खड़ी होकर बच्चियों के बाल संवारा करती थीं और मां का मोबाइल बच्चे के हाथ में होता था। मोबाइल फोन एक तरह से शांति दूत का काम करता था, क्योंकि बहुत सी माताएं बच्चों को चुप रखने के लिए उन्हें बच्चों को थमा देती थीं। बच्चे उस पर कार्टून या नर्सरी राइम्स देखते रहते थे, ताकि माताएं उनके बाल ठीक से जमा सके। लेकिन एक्सपर्ट कहते हैं, ‘यह एक नशा है, अगर आप अबोध बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन दे रहे हैं तो यह उसे एक ग्राम कोकीन देने जैसा है! हालांकि गुजरते वर्षों के साथ पालक इन विशेषज्ञों की सलाह पर कोई ध्यान नहीं देते हैं। मैं अक्सर देखता हूं कि जब एक मां दूसरी किसी मां से बात कर रही होती है और उनके बच्चे स्मार्टफोन पर अकेले कुछ खेल रहे होते हैं। कई घरों में इस बात पर अक्सर विवाद होता है कि बच्चे हाथ से फोन छोड़ते ही नहीं है।
आज कुछ परिवारों में तो यह समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि ‘डिजिटल एडिक्शन’ से पीड़ित 13 वर्ष की उम्र के बच्चों का भी उपचार कराना पड़ रहा है। गुजरात के अहमदाबाद में स्थिति अति-गंभीर है, क्योंकि यहां के अस्पतालों में हर महीने कम से कम 40 मामले ऐसे आ रहे हैं, जिनमें फोन से परेशान बच्चों को सघन मनोचिकित्सा की जरूरत पड़ रही है। इन बच्चों से फोन लिए जाने पर उनका हिंसक व्यवहार या खुद को नुकसान पहुंचाने के मामले भी सामने आ रहे हैं। यही कारण था कि मैं नासिक में दो अलग-अलग बस स्टॉपों पर 10 में से उन सात माताओं को देखकर खुश था जो बच्चे के साथ बस का इंतजार करते हुए बिना स्मार्टफोन आपस में बातें कर रही थीं।
फंडा यह है कि  पैरेंट्स प्रेरक उदाहरण पेश करते हैं तो वे बच्चे को कम्प्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन से दूर करके, उन्हें ज़िंदगी की ‘सच्ची स्क्रीन’ दिखा सकते हैं।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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