बच्चों के सामने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां रखें और सामाजिक उद्देश्यों के काम करवाएं, इससे उन्हें भविष्य मजबूत बनाने में मिलेगी मदद

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस मंगलवार देहरादून से 220 किमी दूर बागेश्वर के जखनी गांव में सैकड़ों महिलाएं, जिनमें आठ साल की बच्चियां तक शामिल थीं, ने एक जंगल में 500 पेड़ों को गले लगा लिया। उनका कहना था कि वे मर जाएंगी, पर पेड़ नहीं कटने देंगी। यहां बांज ओक और बुरांस जैसे उत्तराखंड में ही पाए जाने वाले बहुमूल्य पेड़ हैं, जिन्हें गांव में प्रस्तावित सड़क के लिए काटा जा रहा है। उनका कहना है कि सड़क की जरूरत नहीं है और पेड़ों के कटने से इलाके में पानी की समस्या बढ़ जाएगी।

इसी मंगलवार स्विस एयर टेक्नोलॉजी कंपनी आईक्यूएयर ने वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2020 जारी की, जिसके मुताबिक दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में 22 भारत से हैं। इनमें दिल्ली की क्वालिटी भले ही 2019 और 2020 के बीच करीब 15% बेहतर हुई हो, फिर भी यह दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में 10वें पायदान पर है और उनके अनुसार सबसे प्रदूषित राजधानी है। सबसे प्रदूषित 15 शहरों में से 13 उत्तर भारत से हैं, जिसमें गाजियाबाद दूसरे और बुलंदशहर तीसरे पायदान पर है।

दुनिया की दूसरी सबसे प्रदूषित राजधानी ढाका (बांगलादेश) है और इससे मुझे जर्मनी की ऐना हेरिंगर की याद आई, जिन्होंने ऑस्ट्रिया में यूनिवर्सिटी ऑफ आर्ट्स एक इंडस्ट्रीयल डिजाइन से आर्किटेक्चर की पढ़ाई की है। एक बार वे अपने आर्किटेक्चर के छात्रों को ज्यूरिख से ऑस्ट्रेलिया के पहाड़ों पर ले गईं। जब वे वहां पहुंचे तो ऐना ने यह बताकर उन्हें हैरान कर दिया कि रात के लिए कोई झोपड़ी या होटल बुक नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यह कोई गलती नहीं है, ऐसा जानबूझकर किया गया है।

चुनौती यह है कि हमें यहां जो भी सामान मिले, उससे रुकने का ठिकाना बनाना है।’ और वे सभी ठंड से बच पाए और यह उनके लिए यह सीखने का शानदार अनुभव रहा कि प्रकृति ने बहुत से संसाधन मुफ्त में दिए हैं और उन्हें देखने के लिए संवेदनशीलता तथा इस्तेमाल के लिए रचनात्मकता की जरूरत है। करीब 20 साल पहले ऐना खुद ऐसी स्थिति में थीं, जब उन्हें एक स्कूल बनाने के लिए बांग्लादेश के दूरदराज के एक गांव रुद्रपुर ले जाया गया।

परियोजना को स्थानीय समुदाय के सदस्यों की मदद से पूरा किया गया, जिन्होंने मिट्‌टी, बांस और पारंपरिक निर्माण सामग्रियां इस्तेमाल कीं। दीपशिखा एनजीओ के लिए स्कूल 2006 में पूरा हुआ। वजन सहने वाली मिट्‌टी की दीवारें स्कूल का आधार बनीं, बड़े बांस की संरचनाओं से रोशनी की व्यवस्था की गई। भूतल और प्रथम तल पर कक्षाएं थीं। उनसे जुड़ी छोटी गुफाएं बनाई गईं। इनमें पढ़ाई, आराम या ध्यान कर सकते हैं, अकेले काम कर सकते हैं या खेल सकते हैं।

उन्होंने पैसा जुटाया और सुनिश्चित किया कि सारा पैसा स्थानीय स्तर पर खर्च हो ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था की मदद हो। लोगों ने निर्माण से कमाए पैसों से कपड़े खरीदे या सिलवाए और बाल कटवाए, जिससे पैसा गांव में ही रहा। ऐना मानती हैं कि अगर पैसा सीमेंट और स्टील पर खर्च होता, तो पैसा स्थानीय गांव से बाहर चला जाता।

ऐना की अन्य परियोजनाओं में 2008 में पूरा हुआ, पास ही स्थित इलेक्ट्रिशियन का व्यावसायिक प्रशिक्षण स्कूल ‘देसी’ (दीपशिखा इलेक्ट्रिकल स्किल इंप्रूवमेंट) और मोरक्को में सस्टेनेबिलिटी ट्रेनिंग सेंटर शामिल है। आज भी उनका काम न्यूयॉर्क, ब्रूसेल्स, पैरिस, साओ पाउलो और स्वाभाविक है कि बर्लिन में भी दिखाया जाता है, क्योंकि वे जर्मनी में पली-पढ़ीं हैं। अभी ऐना ऑस्ट्रिया में रहती हैं और विश्वविद्यालयों तथा कॉन्फ्रेंस में व्यापक रूप से लेक्चर देती हैं।

फंडा यह है कि कॉलेज जाने वाले युवाओं के सामने दुनिया की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां रखें और उनसे सामाजिक उद्देश्यों के लिए काम करवाएं। इससे उन्हें अपना कॅरिअर चुनने और भविष्य मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।

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