बच्चों को सिर्फ एक मौके की जरूरत है और फिर खुद देखें कैसे वे सफल-प्रेरणास्पद कहानियों की इबारत लिखते हैं

पिछले साल इस दिन हममें से अधिकांश लोग कोविड के परिणामों से अनजान थे। पर आज हमें मालूम है कि कोविड और इसके चलते लगे लॉकडाउन के बाद अधिकांश घरों में बालिकाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। उन्होंने ना सिर्फ घरेलू काम किए, बल्कि भाइयों की खातिर अपनी पढ़ाई से भी समझौता किया। आज जब भारत राष्ट्रीय बालिका दिवस का उत्सव मना रहा है, यहां बिल्कुल अलग आर्थिक स्तर वाली दो बालिकाओं के दो उदाहरण हैं, जिन्होंने लॉकडाउन के समय का इस्तेमाल खुद को खोजने में किया।

पहली कहानी: कोविड के दौरान जब गीता कराडे के खेतिहर मजदूर माता-पिता को काम मिलने में संघर्ष करना पड़ रहा था, 5 लोगों का परिवार भुखमरी की कगार पर था। अच्छे दिनों में वे 150 रु. कमाते, लेकिन इससे बमुश्किल गुजारा होता। पर ये परिस्थितियां महाराष्ट्र के लातूर से 100 किलोमीटर दूर डोंगरगांव में नवमीं में पढ़ने वाली 14 साल की बच्ची गीता कराडे को प्रेरक कहानी की पटकथा लिखने से नहीं रोक सकीं।

डोंगरगांव में हफ्ते में चार बार आने वाली 35 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता आशा गडकर से गीता ने कुछ दिनों के लिए लोन पर इंटरनेट के साथ मोबाइल दिलाने की गुजारिश की। खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह यूट्यूब से कुछ नए हुनर सीखना चाहती थी। आशा के एनजीओ ने एक अस्थायी फोन और रोज़ाना 2 जीबी इंटरनेट डाटा के साथ उसकी मदद की। गीता कई वीडियोज देखकर पूरा डाटा खत्म कर देती और घर में बिजली नहीं होने के कारण भागकर दादी के घर फोन चार्ज करने जाती।

चंद दिनों में उसे भरोसा हो गया कि वह कुछ कलाकृति बना सकती है। पर परिवार के पास कच्चा माल जैसे धागे, ऊन और सजावटी मोती खरीदने के लिए 200 रु. नहीं थे। ज्यों ही धीरे-धीरे अनलॉक शुरू हुआ, उसने कपास के खेतों में माता-पिता के साथ काम शुरू किया और कच्चे माल के लिए 200 रु. जुटाए। उसके पहले उत्पाद एक मोबाइल बैग, स्कार्फ व डोरमैट थे। स्वसहायता समूह ने ये 150 से 300 के बीच बेचे। दूसरी बार के कच्चे माल के लिए पैसे बचाकर गीता को 100 रु. का विशुद्ध मुनाफा हुआ। अपना बिजनेस शुरू करने के लिए लालायित, आज वह किशोरियों के समूह में दोस्तों को सिखा रही है।

दूसरी कहानी: राजस्थान में जोधपुर से 150 किमी दूर जालोर में रहने वाली सात वर्षीय अर्चना जोशी ने अपने 9 साल के भाई के साथ मिलकर लॉकडाउन के दौरान पूरी रामचरित मानस का पुनर्लेखन कर दिया। स्कूल नोटबुक के 2148 पृष्ठों पर सात कांड पूरा करने के लिए भाई-बहन ने साथ मिलकर रोज 15 पृष्ठ लिखे। इस बृहद् अभ्यास से उनका नई शब्दावली से पाला पड़ा, लेखनी सुधरी, पढ़ने की आदत बढ़ी, प्रश्न पूछने की आदत बेहतर हुई और महान रामायण की खुद से समझ हुई।

इस सबकी शुरुआत दूरदर्शन पर रामायण के पुन: प्रसारण से हुई, बच्चों ने न सिर्फ सीरियल देखा बल्कि जो देखा उसे बाद में लिखना शुरू कर दिया। बच्चों के इस प्रयास की सराहना हो रही है, ऐसे में उन्होंने अब भगवद्गगीता लिखना शुरू कर दिया है। जब मैंने शनिवार को उनसे बात की, तो वे इसके 15 अध्याय पूरे कर चुके थे और तीन बाकी थे। इसने उनके भाषाई कौशल और संस्कृत जैसी भाषा की समझ को विस्तृत कर दिया है। ये प्रयास प्रसंशनीय हैं क्योंकि आजकल के बच्चे लिखने के बजाय कंप्यूटर पर टाइप करते हैं।

फंडा यह है कि बच्चों को सिर्फ एक मौके की जरूरत है और फिर खुद देखें कैसे वे सफल-प्रेरणास्पद कहानियों की इबारत लिखते हैं।

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