बदला ही लेना है तो कानूनी तरीके से लीजिए!

खासतौर पर सिनेमा की बात करें तो, अब पुराने दौर की बदला लेनी वाली कहानियां लगभग दम तोड़ती नजर आती हैं। इन कहानियों में नायक अपने किसी प्रियजन के सिर पर हाथ रखता था और कसम खाता था कि “देख लेना, मैं एक दिन लौटकर आऊंगा, और तुम्हें छोडूंगा नहीं”। लेकिन, अब इस तरह की कसम के लिए आज के दौर की फिल्मों में स्पष्ट ‘ना’ है। शायद यही कारण है कि एक फिल्मकार के लिए बदले की भावना के पुरानी किस्से को नए थ्रिलर रूप खाने के लिए बहुत स्मार्ट सोच और उसका क्रियान्वन जरूरी है। 2019 में रिलीज हुई निर्देशक सुजॉय घोष ने अपनी फिल्म “बदला’ ने ऐसा ही रोमांचक थ्रिलर, वास्तविक लगने वाले उतार-चढ़ाव बेहतरीन इफेक्ट्स के साथ दिखाए हैं। इस फिल्म में कैसे नैना (तापसी पन्नू) पर अर्जुन (टोनी ल्यूक) के कत्ल का आरोप लगाया जाता है और उसके वकील केस को सुलझाने और नैना को बचाने के लिए सीनियर एडवोकेट बादल गुप्ता (अमिताभ बच्चन) की सेवाएं लेते हैं, लेकिन वह बादल के सामने जो कहानी सुनाती है उससे इस मर्डरी मिस्ट्री में घुमाव आ जाते हैं? जिन भी लोगों ने यह फिल्म देखी होगी वे मेरे साथ रजामंद होंगे कि कहानी में अमृता सिंह और उसके पति कितने शातिर होते हैं! हालांकि सच्चाई ये है कि यह फिल्म एक स्पेनिश फिल्म ‘द इनविसिबल गेस्ट’ का रीमेक थी, लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस फिल्म का बड़ी अच्छी तरह से भारतीयकरण किया गया था और इसमें महाभारत से भी कई संदर्भ लिए गए थे। मुझे इस फिल्म का ध्यान तब आया जब मैंने शनिवार के दिन बेंगलुरु के मीडिया में वहां के केम्पेगौड़ा बस स्टैंड के सबवे की दो तस्वीरें देखीं। बरसों से हॉकरों से भरे रहने वाले इस सबवे की तस्वीर में एक भी हॉकर दिखाई नहीं दे रहा था। वजह ढूंढ़ी तो पता चला कि यह सब एक आदमी के “बदला’ लेने के कारण हुआ है, जिसका वादा पेशे से सॉफ्टवेयर इस आदमी ने खुद से किया था। यह वादा था कि वह इस सबवे से हॉकरों को साफ करवा देगा और यहां से चंद कदमों की दूरी पर बने अपरपेट पुलिस स्टेशन के अधिकारियों को भी एक सबक सिखाएगा। और ऐसा हुआ भी, क्योंकि हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के बाद उसने एक तीर से दो शिकार करके अपना “बदला’ ले लिया। इस बदले की कहानी शुरू होती है दिसंबर 2018 में इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर और एक हॉकर में हुई कहासुनी से। सबवे में लगभग कब्जा जमाए हॉकर से उस इंजीनियर की इस जुबानी जंग को लोगों ने “सामान्य’ घटना समझा। लेकिन जब दोनों में कोई समझौता नहीं हुआ तो उस हॉकर ने इंजीनियर का मोबाइल और वॉलेट छीन लिया और लौटाने से इनकार कर दिया। इंजीनियर हॉकर की शिकायत करने और मदद मांगने तुरंत ही अपरपेट पुलिस स्टेशन पहुंचा, लेकिन वह यह देखकर हैरान रह गया कि उसका मोबाइल-वॉलेट वहां के सब इंस्पेक्टर के पास पहले ही पहुंच चुके थे। इंस्पेक्टर ने पीड़ित को न्याय दिलाने की जगह धमकी दी और कहा कि आगे से कभी उसे हॉकर से मत उलझना और उसका मोबाइल और वॉलेट लौटा दिया। इंजीनियर को अपनी चीजें मिल जाने के बाद वह इस मामले को और आगे नहीं बढ़ाना चाहता था लेकिन उसके मित्र रविकुमार कंचनाहल्ली ने कहा कि हमें पुलिस और जिम्मेदार अधिकारियों तक अपनी पीड़ा पहुंचानी चाहिए। लेकिन, ऐसा करने पर पुलिस ने रवि के साथ भी वैसा ही बर्ताव किया जैसा कि इंजीनियर के साथ किया था। नतीजा यह हुआ कि 25 अप्रैल 2019 को रवि ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका लगाकर न्याय की मांग की और कहा कि कोर्ट, पुलिस और प्रशासन को सबवे से हॉकरों को हटाने के आदेश दें। इस मांग के पीछे एक बड़ी वजह यह भी कि सबवे पुलिस वालों के लिए ऊपर की कमाई का एक बड़ा जरिया और हॉकरों के लिए आजीविका था। दुकानदारों ने बताया कि पुलिसकर्मी एक शिफ्ट में 4000 रुपए तक की वसूली करते हैं। हर एक हॉकर को दिन में तीन बार 20-20 रुपए की भेंट चढ़ानी होती है। इस तरह सभी हॉकर पुलिसकर्मियों को दिनभर में 12,000 रुपए का ‘हफ्ता’ चुकाते थे। कोर्ट ने मामले में संज्ञान लेकर आदेश दिया है सबवे को पूरी तरह साफ करवाइए और वहां एक भी हॉकर नहीं दिखना चाहिए। यही कारण था कि शनिवार को पूरी तरह से खाली सबवे की तस्वीर देखने के बाद मैं और आप अपरपेट पुलिस स्टेशन के कर्मियों के खाली वॉलेट की तस्वीर की कल्पना कर सकते हैं।
फंडा यह है कि  आज हम ऐसे दौर में है जहां अगर किसी अन्याय के प्रति ‘बदला’ लेना हो तो अपनी समझदारी और सही अधिकारियों तक पहुंच बनाकर कानूनी तरीके से ऐसा किया जा सकता है और आपको ऐसा करने के लिए गुजरे दौर के नायक की तरह कसम खाने की जरूरत भी नहीं है।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply