बाहर एक शानदार दुनिया है, जो हमेशा गरीबों और वंचितों की मदद करना चाहती है, लेकिन वे चाहते हैं कि मदद उस व्यक्ति तक पहुंचे, जो इसका हकदार है

Management Funda by N. Raghuraman

एक तरफ बहुत से वे युवा हैं जिन्हें जीवन में मार्गदर्शन और सफलता के अवसर की तलाश है, जैसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड़-पट्‌टी (स्लम) धारावी में रहने वाला 23 वर्षीय विनायक होसामानी। वहां कई कक्षाओं में कई बार फेल होना आम है, मुख्यत: इसलिए क्योंकि वे पहली बार स्कूल जाते हैं और उन्हें पढ़ने और कुछ हासिल करने के लिए सहायक माहौल नहीं मिलता।

दूसरी तरफ बाहर एक शानदार दुनिया है, जो हमेशा गरीबों और वंचितों की मदद करना चाहती है, लेकिन वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मदद उस सही व्यक्ति तक ही पहुंचे, जो इसका हकदार है। वे अपनी आंखों से नतीजा देखना चाहते हैं।

वे वंचित, जो यह संपर्क पा लेते हैं, वे जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन यह संपर्क शैक्षिक योग्यता से नहीं बनता बल्कि उनकी मानवता से बनता है, जो उनके व्यवहार में झलकती है। और विनायक की कहानी ऐसी ही है। उसका ढीला रवैया उसके माता-पिता के लिए परेशानी का सबब बन गया था, खासतौर पर उसकी मां के लिए। वह बहुत शरारती बच्चा था। उसके पिता जानते थे कि वह होशियार है लेकिन उन्हें चिंता होती थी कि स्लम के खराब माहौल में फंसकर लड़का हाथ से निकल जाएगा।

पांचवीं में फेल होने पर धारावी के इस लड़के को उस इलाके के श्री श्री विद्यामंदिर (श्री श्री रविशंकर द्वारा संचालित) में भर्ती किया गया, जिसमें दसवीं कक्षा तक में 500 से ज्यादा वंचित पृष्ठभूमि के बच्चे पढ़ते थे। धारावी में मशहूर चमड़ा बाजार की एक वर्कशॉप में काम करने वाले विनायक के पिता को लगा कि दिनभर स्कूल में बिताने पर उनका बेटा स्लम के अन्य बहकावों में नहीं उलझेगा।

लेकिन वह बारहवीं में फिर फेल हो गया। एक बार नहीं, दो बार। उस दौरान विनायक ने कुछ छोटी-मोटी नौकरियां कीं और वह अपने जीवन के बर्बाद हुए दो वर्षों को लेकर बेपरवाह था। लेकिन उसके गुणों ने उसके जीवन की दिशा बदल दी। उसकी शिक्षिका प्रिया नाइक ने विनायक के स्कूल के दिनों में देखा कि वह एक आज्ञाकारी और जिम्मेदार बच्चा था। उसकी ज्यादातर रुचि स्कूल की सामुदायिक भोजन की गतिविधियों में रहती थी और शिक्षक जानते थे कि उसके अंदर रसोई को लेकर रुचि है।

इसलिए जब स्कूल को हैदराबाद में ‘कलीनरी एकेडमी ऑफ इंडिया’ में बच्चों को भेजने के लिए एक स्पॉन्सर मिला तो उन्होंने विनायक को भेजने का फैसला लिया। इस स्कॉलरशिप के लिए आर्ट ऑफ लिविंग के एक वॉलंटियर ने राशि दी क्योंकि स्कूल इसी संस्थान की शाखा है।

हालांकि विनायक को यह स्कॉलरशिप थाली में सजी नहीं मिली। उसे कई इंटरव्यू और टेस्ट देने पड़े, तब जाकर उसे 15 लोगों में से 10 महीने के होटल मैनेजमेंट प्रोग्राम के लिए चुना गया। विनायक के चुनाव से उसके माता-पिता का डर गर्व में बदल गया। उसने 2020 का नया साल यूके के लक्जरी क्रूज़ लाइन ‘आर्केडिया’ में बतौर ‘कौमी शेफ’ शुरू किया।

वह इस जनवरी में यूके के साउथएम्पटन गया था और नवंबर में लौटेगा। अब विनायक के मन में अगला लक्ष्य है। पहला तो स्लम के एक कमरे के घर से निकलकर मुंबई में कहीं फ्लैट खरीदना है। और साथ ही उसे परिवार को अगले स्तर पर ले जाने के लिए रेस्त्रां बिजनेस शुरू करना है। बेशक विनायक की परवरिश और मेहनत ने ही उसे इस मुकाम तक पहुंचाया है। लेकिन उसके आधारभूत मानवीय गुणों ने उसे इस सफलता से जोड़ा।

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु।

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