बिज़नेस में ‘पीपल फर्स्ट’ पॉलिसी हमेशा फायदेमंद

कई कारण हैं कि आमतौर पर नेताओं के भाषण मुझे आकर्षित नहीं करते। लेकिन, गुरुवार के दिन इस अखबार के द्वारा जयपुर में आयोजित एक कॉन्क्लेव में राजस्थान के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने एक ऐसी घटना सुनाई, जिसके बाद मैं अपनी नापसंदगी को लेकर सोचने पर मजबूर हो गया। उन्होंने बताया, ‘कुछ महीनों पहले विधानसभा के लिए चुने जाने के बाद मैं राज्य के कैबिनेट मिनिस्टर के रूप में शपथ ले रहा था, तो कई विशेष सुविधाएं अचानक ज़िंदगी का हिस्सा बन गईं। शपथ के बाद मेरे इस्तेमाल के लिए मिली सरकारी गाड़ी सबसे पहली और सबसे तेज सुविधा थी।’ दिलचस्प यह था कि जब वे शपथ ले रहे थे, तो गाड़ी उनके इंतजार में बाहर लग चुकी थी – सुविधा मिलने की इस गति को देखकर उन्हें भी बड़ा आश्चर्य हुआ।
खाचरियावास शपथ लेकर निकले तो उनकी नज़रें अपने निजी वाहन को खोज रही थी, जिसमें बैठकर वे आए थे। तभी उनके मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि आप सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल क्यों नहीं कर लेते? इसके बाद उन्होंने बताया कि कैसे हर नवनियुक्त मंत्री को लेकर ये गाड़ियां एक के बाद एक निकलीं और यह दृश्य बिलकुल बॉलीवुड की फिल्मों जैसा था। राज्यपाल के निवास के थोड़ा आगे सड़क कई दिशाओं में बंटीं तो खाचरियावास ने भी अपने निवास स्थान वाली राह पकड़ी। रास्ते में उन्हें बाहर से एक धीमी आवाज सुनाई दी। लगा जैसे कोई मारवाड़ी लहजे में उन्हें पुकार रहा था। उन्होंने गाड़ी रुकवाई और कांच नीचे किया तो सामने से एक आदमी पास आकर बोला, ‘भाई साहब, देखो थाने जिता दियो न, थाने (आप) मैं यो पेली ही कियो हो, चिंता मत करो, थे जीतोळा।’ खाचरियावास गाड़ी से उतरे और उसे गले लगाते हुए बोले- ‘तू मने जिता दियो, अब बता थारो काई काम है।’ वह बोला, ‘थे जीत ग्या ई में ही म्हारो काम हो ग्यो।’ उनकी आंखें भर आईं और अपने आपको संभालते हुए उन्होंने उसे फिर से गले लगाया। उसने कहा भाई साहब ‘थांके जीतता ही ठेकेदार भी सीधो हो ग्यो।’ तो खाचरियावास ने उससे कहा, ‘अबकी बार तने परमानेंट करा देस्यां।’ उसने कहा, ‘भाई साहब परमानेंट की चिंता कोनी। अब थे जीत ग्या म्हारों दुख मिट ग्यो। थे जद भाषण में बोलता था के मैं अबके हार ग्यो तो म्हारी राजनैतिक हत्या हो जावेळी। मैं थाने मरता कोनी देख सकां।’ वह यह भी बोला, ‘भाई साहब ओर काम व्हे तो मने बता दीजो।’ यह अजनबी सिविल लाइंस सड़क पर मैले-कुचेले कपड़ों में झाडू लगाने वाला एक अस्थायी कर्मचारी था।
कॉनक्लेव में यह अनुभव सुनाते हुए खाचरियावास ने वहां बैठे उद्यमियों से एक अपील की, ‘आपके साथ काम करने वाले लोग आपकी बहुमूल्य संपत्ति हैं। ‘स्लो-डॉउन’ के डर में भी आपको उनकी नौकरी बनाए और बचाए रखनी चाहिए। मैं जो कुछ कर सकता हूं, जरूर करूंगा और इसीलिए मैं आपके साथ अपना मोबाइल नंबर शेयर कर रहा हूं ताकि राज्य सरकार से कोई मदद चाहें तो मैं पूरा कर सकूं और मैं सीएम साहब की मदद लेने की कोशिश करूंगा।’ जाने से पहले उन्होंने एक बार फिर जोर देकर कहा, ‘ध्यान रखिए, ये हमारे ही साथी हैं जो हमें बनाते हैं।’ उस दिन उन्होंने सकारात्मकता का एक बीज, जानबूझकर इसीलिए बोया ताकि वहां मौजूद हर उद्यमी ‘बिजनेस सॉल्यूशन’ की ओर बढ़े।

फंडा यह है कि हमारे अपने ही लोग हमें बिज़नेस में आगे बढ़ाते हैं। अगर कभी ऐसा ‘धीमी प्रगति’ का दौर आता भी है तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनका खयाल रखें। आखिर में वे ही कम्पनियां दिन तरक्की करती हैं जो ग्राहकों के पहले अपने कर्मचारियों को भी महत्व देती हैं।

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