बिना अपवाद, हर पेशे में नैतिकता जरूरी है

साल 2018 में भारत में 43,600 दोपहिया चालकों की मौत हेलमेट न लगाने के कारण हुई, जो 2017 की तुलना में 21% ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का हवाला देते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हेलमेट पहनने से मोटरसाइकिल सवारों में घातक चोट लगने का जोखिम 70% तक कम हो जाता है और मौत की आशंका भी करीब 40% तक घट जाती है। लेकिन इस रिपोर्ट में अन्य क्षेत्रों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है और जितना मुखर होकर मेट्रो मैन के नाम से मशहूर दिल्ली मेट्रो के प्रमुख सलाहकार ई श्रीधरन कहते हैं और कोई नहीं कहता। श्रीधरन कहते हैं, “शिक्षा जगत में टैलेंट और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में क्षमताओं की कमी सीधे तौर पर सड़क दुर्घटनाओं के रूप में सामने आ रही है और इनमें होने वाली मौतों के पीछे सड़कों की गलत डिजाइन और उनकी खराब देखभाल है!’
केरल के कोझिकोड में मंगलवार को ‘इंजीनियरिंग डे’ समारोह का शुभारम्भ करने के बाद उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि इंजीनियरिंग की शिक्षा और इस प्रोफेशन में काम को विनियमित करने के लिए एक वैधानिक प्रोफेशनल बॉडी न होना इस क्षेत्र में हो रही गंभीर खामियों के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने सवाल खड़ा करते हुए कहा, “कल्पना कीजिए कि हमें देश में उत्कृष्ट इंजीनियर न होने की कितनी कीमत चुकानी पड़ती है’।
श्रीधरन ने इंजीनियरों की अधिमान्यता को लेकर इस तरह की नियामक संस्था की जरूरत के बारे में पीएम मोदी को पत्र लिखा है और दो वर्ष पहले वे यह विषय मानव संसाधन मंत्री के समक्ष प्रोफेशनल इंजीनियर्स बिल के ड्राफ्ट को लेकर यह विषय उठा चुके हैं, जिसे आईआईटी मद्रास के पूर्व निदेशक एमएस अनंत की अध्यक्षता वाली कमेटी ने तैयार किया था।
श्रीधरन ने मंगलवार को कहा “मुझे उम्मीद है कि यह बिल इंजीनियरों को दी जाने वाली शिक्षा और देश में इंजीनियरिंग के प्रोफेशन को नियंत्रित करेगा और इसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा’। इस बीच अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने एक नया आइडिया दिया है जिसमें इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स को अपना ग्रेजुएशन पूरा होने से पहले एक्टिविटी पाइंट प्राप्त करने होंगे अन्यथा उन्हें डिग्री प्रदान नहीं की जाएगी।
छात्रों को एक्टिविटी पॉइंट ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने पर मिलेंगे और साथ ही उन्हें कोई नई तकनीकी पहल करनी होगी, जिससे उनके शहर और राज्य के लोगों की किसी समस्या का निदान हो सके। इंजीनियरिंग के छात्रों को कम से कम 90 घंटे समाज का भला करने वाली गतिविधियों के लिए देने होंगे जो उनके 8वें सेमिस्टर का हिस्सा होंगी।
एआईसीटीई द्वारा निर्धारित इन 15 गतिविधियों में प्रमुख रूप से शामिल हैं- अच्छा रिजल्ट प्राप्त करने और उच्च या तकनीकी या व्यावसायिक शिक्षा में छात्रों का नामांकन बढ़ाने में स्थानीय स्कूलों की मदद करना, गांवों की आय बढ़ाने के लिए एक व्यावहारिक बिज़नेस प्रस्ताव तैयार करना, टिकाऊ जल प्रबंधन प्रणाली विकसित करना, इनोवेटिव तरीके से पर्यटन को बढ़ावा देना, उपयुक्त टेनोक्नोलॉजी का प्रसार करना, ऊर्जा की खपत में कमी करना, ग्रामीणों के कौशल को बढ़ाना, 100 प्रतिशत डिजिटल लेन-देन की सुविधा देना, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों में योगदान के लिए अग्रणी महिलाओं को सूचना प्रदान करने वाले क्लब की स्थापना, कुशल कचरा निस्तारण प्रणाली का विकास और प्रबंधन, ग्रामीण उपज की मार्केटिंग में सहायता करना, खाद्य संरक्षण या पैकेजिंग, स्थानीय गतिविधियों का ऑटोमेशन, रूरल आउटरीच कार्यक्रमों के तहत जन जागरूकता फैलाना और डिजिटल इंडिया या स्किल इंडिया या स्वच्छ भारत इंटर्नशिप, आदि जैसी किसी भी राष्ट्रीय स्तर की पहल में योगदान, जिसमें वीकएंड और छुट्टियों के दौरान छात्र अपनी भागीदारी कर सकते हैं।
अधिकारियों के मुताबिक यह नया नियम बी.ई या बीटेक के छात्रों पर लागू होगा, और विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी, कर्नाटक जैसे विश्वविद्यालयों ने पहले ही इसे 2019-20 शैक्षणिक वर्ष से लागू कर दिया है।
इस तरह का मौका मिलने से निश्चित रूप से प्रोफेशनल लोगों के दिमाग खुलेंगे और जब वे लोगों के लिए कुछ अच्छा करेंगे तो अपने कार्यक्षेत्र में उनकी योग्यता बढ़ेगी। ऐसा होगा तो कम से कम कोलकाता में तीन साल पहले निर्माणाधीन पुल के ढहने जैसी स्थितियां नहीं बनेंगी, जिसके बारे में श्रीधरन ने पहले ही चेताया था और अफसोस जाहिर करते हुए कहा था “इससे पता चलता है कि देश में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नैतिकता खत्म हो रही है।’
फंडा यह है कि अगर हम हर एक पेशे में नैतिकता बनाए रखना चाहते हैं तो कॉलेज की शिक्षा के दौरान छात्रों को इंजीनियरिंग की ही तरह, समाज की भलाई के कामों से परिचित कराएं, ताकि वे प्रोफेशनल बनने पर उस नैतिकता को बरकरार रखें।

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