बुरे वक्त को स्वीकार करें, भले ही वह कचरे के डिब्बों वाली जगह ही क्यों न ले जाए, समय आपकी किस्मत जरूर बदलेगा

महाभारत का एक प्रसंग है, जिससे 18 दिन का यह युद्ध समाप्त हो गया था। अचानक युधिष्ठिर ने मूर्खतापूर्ण ढंग से अपने शत्रु भाई दुर्योधन के प्रति दया दिखाने का फैसला लिया। उन्होंने दुर्योधन से कहा कि वे लड़ने के लिए किसी एक पांडव को चुन लें। अगर दुर्योधन युधिष्ठिर के इस मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो वह भीम को छोड़कर बाकी सभी पांडवों को आसानी से मार देता। लेकिन कृष्ण ने ऐसी किसी संभावना को पहले ही खत्म कर दिया।

उन्होंने दुर्योधन के पराक्रम की सराहना करते हुए कहा कि महान दुर्योधन हमेशा ऐसा प्रतिद्वंद्वी चुनते हैं जो उनके लायक हो। वे अपना समय कमजोर के साथ लड़ने में बर्बाद नहीं करेंगे। उनके लिए केवल भीम ही उपयुक्त हैं। दुर्योधन इस जाल में फंस गया और उसने तुरंत माना कि कृष्ण सही हैं और उसे भीम से ही लड़ना चाहिए। आप यह कहानी तो जानते ही हैं कि कैसे कृष्ण ने भीम को दुर्योधन की जंघाओं पर वार करने को कहा, जो उसे मारने का एकमात्र तरीका था। भीम हिचक रहे थे क्योंकि यह लड़ाई के नियमों के विरुद्ध था। लेकिन कृष्ण के समझाने पर उन्होंने दुर्योधन की जंघाओं पर वार किया और वह धराशायी हो गया। अब इसे कृष्ण की चतुराई कहें या अच्छाई को बचाकर, अच्छे लोगों के साथ बुरा करने वाले को सजा देने का तरीका। यह अंतहीन बहस है।

मुझे महाभारत का यह किस्सा तब याद आया जब मैंने 51 वर्षीय पूर्व रेस्त्रां मैनेजर बर्नार्ड एलेक्जेंडर के बारे में पढ़ा, जिन्हें अप्रैल में रेस्त्रां में डाइन-इन स्थगित होने के बाद एक रेस्त्रां ने नौकरी से निकाल दिया था। रेस्त्रां मालिकों तक पहुंचने के उनके सारे प्रयास असफल रहे। महीनों नौकरी तलाशने के बाद आखिरकार एलेक्जेंडर मुंबई के नगरीय निकाय में कचरा गाड़ी के ड्राइवर के हेल्पर के रूप में काम करने लगे। ड्राइवरों को अक्सर डंपिंग ग्राउंड में किसी के साथ की जरूरत होती है और एलेक्जेंडर उनके साथ जाने लगे। एलेक्जेंडर कभी 70 हजार रुपए प्रतिमाह कमाते थे, लेकिन अब वे प्रति ट्रक 50 रुपए कमाने को तैयार थे, जबकि दिन में कभी पांच ट्रक से ज्यादा के साथ नहीं जा पाते थे।

अब मेरा सवाल यह है कि परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों में कितने ऐसे लोग होंगे जिन्होंने सिर्फ चार महीने में एक अपर-क्लास रेस्त्रां के मैनेजर से कचरा गाड़ी के हेल्पर के उल्टे सफर पर एलेक्जेंडर को टोका होगा, उकसाया होगा, सवाल उठाए होंगे? क्या वे दुर्योधन की तरह इनका शिकार हुए? नहीं। यहां मैं खाली पेट, झूठी प्रतिष्ठा की बात कर रहा हूं। एलेक्जेंडर का वजन कम हो गया, उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया और वे खानाबदोश की तरह दिखने लगे। इसके बावजूद उन्होंने काम जारी रखा।

परिवार के लिए रोटी कमा रहे इस व्यक्ति की दु:खद कहानी पढ़ने के बाद हॉस्पिटैलिटी के कुछ लीडर्स ने मंगलवार को एलेक्जेंडर को बुलाया। और सोमवार पहला दिन था जब वे कचरा गाड़ी के साथ नहीं गए क्योंकि मीटिंग से पहले वह इतने दिनों में खुद पर जमी गंदगी साफ करना चाहते थे।

फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ का यह गाना हमेशा याद रखें, ‘दुनिया में रहना है तो काम कर प्यारे, हाथ जोड़ सबको सलाम कर प्यारे….. खेल कोई नया सुबह-ओ-शाम कर प्यारे’। आत्महत्या जैसे बेवकूफी भरे ख्याल न आने दें। मुझे लगता है कि एलेक्जेंडर की कहानी उन लोगों को राह दिखा सकती है, जिनकी नौकरी कोरोना की वजह से चली गई है।

फंडा यह है कि समय आपकी किस्मत बदलेगा। बस बुरे वक्त को स्वीकार करें, भले ही वह कचरे के डिब्बों वाली जगह ही क्यों न ले जाए।

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