भरोसे का सही मतलब है सम्पूर्ण समर्पण!

दशकों पहले की बात है, नागपुर में एक सर्कस शो के दौरान मैं पहली कतार में बैठा था। एक जोकर ने जमीन से कई फीट ऊंचे दो टॉवर के बीच बंधी रस्सी पर चलना शुरू किया। तभी दर्शकों में से “ऊह -ऊह’ की आवाजों ने मेरा ध्यान खींचा। वह उस पतली सी रस्सी पर हाथों में लम्बी सी लकड़ी लिए संतुलन बनाते हुए, एक टॉवर से दूसरे की ओर बढ़ रहा था। नीचे जमीन पर उसके चार साथी गर्दन उठाए उसकी ओर देख रहे थे। वे इसलिए चल रहे थे ताकि कोई हादसा हो जाए तो वे जोकर की जान बचा सकें। इसे देख मेरा बाल मन डर गया। जैसे ही वह टॉवर के दूसरी ओर पहुंचा, हमारे बीच खुशी की लहर दौड़ गई। सबने खूब तालियां बजाईं।
तभी मेरे कद का एक बौना जोकर हम बच्चों के बीच आया और पूछा- “क्या वो जोकर रस्सी पर चलकर दूसरी तरफ जा सकता है।’ हमने चिल्लाकर जवाब दिया, “हां, हां, जा सकता है’। फिर उसने मेरी आंखों में देखकर कहा, “क्या तुम्हें भरोसा है?’ मैंने कहा “हां, मुझे भरोसा है’। फिर वह जोकर हम बच्चों के थोड़ा और करीब आया और कहा- “ठीक है, क्या तुममें से कोई उसके कंधे पर बैठना चाहेगा, वह तुम्हें रस्सी की दूसरी तरफ बिठाकर ले जाएगा’? तभी अचानक मैंने देखा कि पिताजी मेरी कलाई जोर से पकड़कर नीचे दबा रहे हैं। मैंने उनकी ओर देखा और उनकी आंखों की मूक भाषा पढ़ी- वे कह रही थीं “नहीं’, और मैं चुप रह गया। जोकर के इस सवाल के बाद वहां लगभग सन्नाटा छा गया और हर कोई मेरी तरह चुप था। जोकर बोला, “कोई बात नही’ और वह तेजी से टॉवर पर चढ़ गया और ऊपर वाले लम्बे जोकर के कंधे पर बैठ गया और फिर दोनों आराम से रस्सी के दूसरी तरफ बढ़ चले। नीचे जमीन पर पहले के चार लोगों का साथ देने उनके चार और साथी आ गए थे।
बीते शुक्रवार को अचानक मुझे यह घटना उस समय ध्यान में आई, जब मैं मप्र के खंडवा से लौटते समय प्रसिद्ध ओंकारेश्वर तीर्थ में नर्मदा नदी के किनारे खड़ा था। यह तीर्थ 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगो में से एक है। एक कार चालक पिछले 10 मिनट से संशय में वहां खड़ा था, और शायद सोच रहा था कि वह नंगे पैर तीखे पत्थरों, रेत और यहां-वहां लापरवाही से फेंके कचरे से भरे रास्ते पर चल पाएगा या नहीं। चूंकि, वहां मेरी तरह कलाई मरोड़ देने वाले उसके पिता नहीं थे, तो वह कुछ सोचकर नदी की ओर चल पड़ा। उसने वहां प्रार्थना की, नमन किया और सकुशल लौट आया। हो सकता है कि उसे बुलाने वाली दैवीय शक्ति ने उसके रास्ते की बाधा दूर की होगी, ठीक वैसे ही जैसे मेरी यादों के सर्कस में नीचे चार अतिरिक्त साथी बौने जोकर की सुरक्षा के लिए चल पड़े थे, जबकि उसे इसका पता ही नहीं था। जब मैं इंदौर की ओर बढ़ रहा था तो रास्ते में उसी तरह के पथरीले रास्ते पर नंगे पैर चलते सैकड़ों कांवड़ यात्रियों को देखा। वे सभी ओंकारेश्वर से 130 किलोमीटर दूर उज्जैन की ओर जा रहे थे, जहां एक और ज्योतिर्लिंग के रूप में महाकाल विराजे हैं। मैंने रास्तों की दुर्दशा देखी जिस पर कांच के टुकड़े और कई तरह का कचरा भरा पड़ा था। जिन भी लोगों ने उसे फेंका होगा, उन्हें कांवड़ यात्रियों की जरा भी चिंता नहीं रही होगी। लेकिन, ऐसे दृश्य पर मेरी खीज कुछ देर में शांत हो गई, क्योंकि मैंने इन यात्रियों के चेहरों पर अंशमात्र चिंता नहीं देखी। मैं एक जगह पर रुका जहां ऐसे यात्री कुछ देर के लिए आराम कर रहे थे। मैंने ऐसे ही एक यात्री से पूछा, “क्या इस तरह के रास्ते से परेशानी नहीं होती?’ आप उसका जवाब सुनकर हैरान होंगे। उसने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाए और बोला, “अगर उसने हमें बुलाया है, तो फिर ये उसी की जिम्मेदारी है कि वह हमारा ध्यान रखे, भला हम चिंता क्यों करें’? मैंने उसे नमस्कार किया और बिना एक शब्द बोले वहां से उठ गया क्योंकि उसने एक बार फिर से मेरे भरोसे और मेरी आस्था को पक्का कर दिया था।
फंडा यह है कि  चाहे वह ईश्वर, माता-पिता या फिर हमारे शिक्षकों के प्रति हो, भरोसे के लिए सम्पूर्ण समर्पण करना जरूरी है।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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