भारत को धरती का सबसे खूबसूरत देश बनाने के लिए शहरी और ग्रामीण भारत को अपने सर्वोच्च गुण एक-दूसरे को सिखाने चाहिए

इस सप्ताहांत जब मैं नई दिल्ली के टी2 एयरपोर्ट पर था, मेरे पास काफी समय बचा था क्योंकि मेरी फ्लाइट लेट हो गई थी। आमतौर पर मैं देरी से परेशान नहीं होता। एयरपोर्ट की सभी औपचारिकताएं खत्म कर मैं क्रेडिट कार्ड कंपनियों द्वारा चलाए जाने वाले लाउंज में पनाह ले लेता हूं। टी2 एयरपोर्ट पास ही बने देश के बड़े एयरपोर्ट्स में से एक टी3 से छोटा है।

मैं जब यहां चलने वाले एकमात्र लाउंज में पहुंचा तो काउंटर के बाहर 10 लोगों की लाइन देखी। उस छोटे लाउंज में इतने लोगों को संभालने की क्षमता नहीं थी। खासतौर पर तब, जब फ्लाइट कोहरे या अन्य कारण से लेट हो। मैं चेहरों पर खीझ देख सकता था।

पूछने पर पता चला कि जो लोग अंदर हैं, उन्होंने पहले ही खाना खा लिया है लेकिन वे अब भी अंदर हैं क्योंकि उनकी फ्लाइट लेट हैं और वे प्राइवेट क्यूबिकल में किताबें पढ़ रहे थे, ताकि सार्वजनिक जगह पर न बैठना पड़े, जहां शायद ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता है, जो कोरोना के समय में जरूरी है।

बाहर खड़े लोगों को लग रहा था कि अंदर बैठे लोगों में बाहर खड़े लोगों के लिए कोई मानवता और लिहाज नहीं है। दिलचस्प यह है कि अंदर वाले, बाहरियों को देख सकते थे, जबकि बाहरी रंगीन कांच के कारण ऐसा नहीं कर सकते थे। और अंदर वालों को लग रहा था कि उन्हें वहां बैठकर कम से कम दो घंटों के लिए, बिना व्यवधान के सुविधाओं का आनंद लेने का अधिकार है क्योंकि उन्होंने पैसे दिए हैं।

बाहरी, लाउंज मैनेजर से बहस कर रहे थे कि वह अंदर जाकर मानवता का सबक क्यों नहीं सिखाता। मैनेजर ने रूखेपन से कहा कि उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है, जब तक कि किसी व्यक्ति के क्रेडिट कार्ड कंपनी द्वारा दिए गए दो घंटे पूरे नहीं होते।

फिर अचानक एक फ्लाइट चलने को तैयार हो गई और अंदर से कुछ लोग बाहर आ गए और सभी बाहरियों को अंदर बैठने की जगह मिल गई, जिनमें मैं भी था। लेकिन फिर 11 लोगों की एक नई लाइन बन गई, जिससे उन बाहर वालों के लिए हम अंदर वाले बन गए। मैंने 15 मिनट में जल्दी-जल्दी खाना खत्म किया और जाने के लिए तैयार हो गया।

लेकिन मैंने जो देखा उससे हैरान रह गया। जो लोग ज्ञान दे रहे थे कि अंदर वालों को बाहर खड़े लोगों की जरा भी परवाह नहीं, उन्होंने ही अंदर दो घंटे बैठकर बदला लेने का फैसला ले लिया। दुर्भाग्य से, जिनसे ये बदला लेना चाहते थे, वे पहले ही प्लेन में बैठ चुके थे और उन्हें खबर तक नहीं थी कि उनसे तथाकथित बदला लिया जा रहा था। असली पीड़ित नए बाहरी थे, जो अब नए अंदर वालों को भला-बुरा कह रहे थे।

मैंने सोचा कि जब तक सारे जहाज चले नहीं जाते, युद्ध खत्म नहीं होगा और मैं वहां से चला गया। मुझे यह देख दु:ख हुआ कि कुछ अमीर आबादी, जो स्वास्थ्य और साफ-सफाई को इतना महत्व देती है, वह ऐसा महत्व इंसानों के प्रति विचारों को नहीं देती।

इससे मुझे सिंघु सीमा पर किसानों का आंदोलन याद आया, जो गंदगी भरे माहौल में बिना मास्क के प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन उनका दिल अन्य इंसानों के प्रति बेहद साफ था। मेरा यकीन कीजिए, इस प्रदर्शन में स्वास्थ्य और साफ-सफाई पूरी तरह नजरअंदाज की गई और मैं उसके बारे में लिखकर आपकी सुबह खराब नहीं करना चाहता।

मेरी ख्वाहिश है कि हमारे ग्रामीण सोसायटियों में रहने वाले शहरियों को अपना दरवाजा, घर और दिल खोलना सिखाएं और बदले में शहरी अपने ग्रामीण भाई-बहनों को स्वास्थ्य और साफ-सफाई का पाठ पढ़ाएं।

फंडा यह है कि भारत को धरती का सबसे खूबसूरत देश बनाने के लिए शहरी और ग्रामीण भारत को अपने सर्वोच्च गुण एक-दूसरे को सिखाने चाहिए।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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