‘मां की पाठशाला’ मॉडल ही सही मायनों में आत्मनिर्भर भारत की पहचान है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

क्या आपने कभी कल्पना की है कि गांव की एक गरीब मां आईएएस कैडर के किसी सरकारी अधिकारी को उसके निजी मोबाइल पर फोन कर कह सकती है कि ‘मैं फलां गांव से बोल रही हूं, हमारे बच्चे खेल-खेलकर थक चुके हैं, अब वे कुछ समय पढ़ना चाहते हैं, क्या आप मदद कर सकते हैं।’

आप और मैं चौंक सकते हैं कि उस गरीब को अधिकारी का निजी नंबर कैसे मिला। लेकिन भोपाल, मध्य प्रदेश के जिला पंचायत अधिकारियों को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि वे जानते हैं कि हर गांव के पंचायत कार्यालयों की दीवार पर उनके नाम-नंबर लिखे हैं। लेकिन वे इससे चौंके के कि बच्चे खेल-खेलकर थक चुके हैं। वे सोच रहे थे, ऐसा कैसे हुआ? जवाब जानने के लिए वे किसी बोर्डरूम मीटिंग के लिए नहीं गए। बल्कि गांव गए और वहां रातभर रुके। और अगले दिन सूर्योदय के साथ तस्वीर स्पष्ट हो गई।

शहरी सरकारी स्कूलों के शिक्षक जहां काम करते हैं, उसी शहर में रहते हैं, लेकिन ग्रामीण सरकारी स्कूलों के शिक्षक शहर में रहना पसंद करते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे अपने बच्चों को शहर के निजी स्कूलों में पढ़ाना, बुजुर्ग माता-पिता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आदि। कुछ मामलों में पति/पत्नी शहर में काम करते हैं। ऐसे शिक्षकों की संख्या 75-80% है। इसका गांव के बच्चों पर गहरा असर पड़ता है। वे शिक्षकों से सिर्फ स्कूल के समय मिल पाते हैं।

चूंकि स्कूल मार्च के बाद से नहीं खुले हैं और सरकार ने इन्हें मार्च 2021 तक बंद रखने का फैसला लिया है, शहरों में रह रहे गांव के ये 80% शिक्षक भौतिक रूप से पूरी तरह अनुपस्थित रहे हैं और वर्चुअल उपस्थिति से नौकरी कर रहे हैं।

लेकिन ग्रामीणों की अलग समस्या है। उनके पास स्मार्टफोन, टीवी, इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है और सबसे जरूरी, बिजली आपूर्ति अनियमित है। यहां तक कि शिक्षा की कमी पूरी करने का दूरदर्शन का प्रयास भी कम असरदार हो गया है, क्योंकि वे इसका अच्छे से विज्ञापन नहीं कर पाए और बिजली आपूर्ति खराब है।

इसीलिए करीब 170 ग्रामीण पंचायतों का काम देखने वाले भोपाल के जिला पंचायत अधिकारी ‘भोपाल मॉडल’ लेकर आए, जो करीब 50 गांवों में सफल हो चुका है और जनवरी 2021 के पहले हफ्ते तक बाकी की ग्रामीण पंचायतों में भी लागू होने की उम्मीद है।

भोपाल मॉडल क्या है? अधिकारी दो अलग-अलग विभाग, शिक्षा और पंचायत तथा ग्रामीण विकास को साथ लाए, जिन्हें आमतौर पर अकेले काम करने के लिए जाना जाता है। इससे वे दोनों के संसाधन एकसाथ इस्तेमाल कर पाए। आमतौर पर पंचायत भवन में सभी सुविधाएं होती हैं, लेकिन वे ज्यादातर खाली पड़े रहते हैं। इसलिए उन्होंने फैसला लिया कि वे एक अच्छे टीवी के साथ पेन ड्राइव देंगे, जिसमें सभी स्वीकृत पाठ्यक्रम होंगे। उन्होंने इसमें सेवानिवृत्त शिक्षकों के साथ गांव में रहने वाले शिक्षक जोड़े।

अंतिम लाभार्थियों यानी छात्रों से कहा गया कि वे टाइमटेबल बनाएं और तय करें कि कोविड प्रोटोकॉल को तोड़े बिना कौन, किस दिन कक्षा में आएगा। इस बीच गांव की माताओं को जिम्मेदारी दी गई कि वे बारी-बारी से पूरी कक्षा में रुकें, यह देखने के लिए कि उनके बच्चों ने उस दिन क्या पढ़ा। इसीलिए कक्षा को ‘मां की पाठशाला’ नाम दिया गया, जो उपयुक्त है।

छात्र वहां लाइब्रेरी भी चलाते हैं, जिसमें व्यवस्थाएं वे स्वयं देखते हैं। अब पास के शहर में रहने वाले गांव के शिक्षक भी यह सरगर्मी महसूस कर रहे हैं और धीरे-धीरे योगदान देने के लिए लौट रहे हैं। क्योंकि उन्हें अहसास हो चुका है कि उनके बिना भी बच्चों का काम चल सकता है। गांव की माताओं ने साबित कर दिया कि ‘आत्मनिर्भर’ शब्द के सच्चे मायने क्या हैं।

फंडा यह है कि आधारभूत मुद्दों पर ध्यान दें और बड़ी संख्या में लोगों की समस्या हल करने के लिए प्रभावित लोगों को भी शामिल करें।

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