मां के पल्लू के बिना बचपन अधूरा है!

पिछले हफ्ते के दौरान मैं तीन खाड़ी देशों की यात्रा पर था। मेरी लगभग हर शाम वहां के किसी ऐसे मॉल में बीती, जहां का माहौल बहुत कुछ भारतीय एयरपोर्ट की तरह था। वहां कुछ खरीदारों को पता था कि उन्हें मॉल में कहां जाना है, जबकि कुछ ऐसे ही भटक रहे थे। पिछले हफ्ते में ईद की छुट्‌टियों के कारण सिर्फ दो कामकाजी दिन थे। इसी वजह से इन देशों में हर एक मॉल में भारी भीड़ थी। बहुत से लोग इसलिए भी शॉपिंग कर रहे थे क्योंकि फेस्टिवल डिस्काउंट मिल रहा था, जबकि कुछ छुट्‌टी की शाम काटने के लिए सिर्फ विंडो शॉपिंग से काम चला रहे थे। हर एक फूड कोर्ट में बच्चों का जमघट था। वे खाने के बाद हाथ धोने के लिए बेसिन की तरफ भाग रहे थे और लौटकर हाथ पोंछने के लिए टिश्यू मांग रहे थे। मैंने देखा कि वे खूब सारे टिश्यू मांग रहे थे जबकि उनके हाथ छोटे थे। फिर समझ आया कि वे इन टिश्यू की बॉल बनाकर खेल रहे हैं और अपने हमउम्र बच्चों को निशाना बना रहे हैं। मुझे उनकी मासूम हरकतों में एक कमी जरूर महसूस हुई और वह थी अपने जमाने में खाने के बाद तुरंत मां के पल्लू से हाथ और मुंह पोंछना, और यह सब इतनी जल्दी करना कि वह हमारे हाथ से पल्लू खींच न ले! तब सस्ती लेकिन कड़क सूती साड़ियां हाथ-मुंह पोंछने के लिए कितनी बढ़िया होती थी! ट्रेन और बस यात्रा के दौरान टॉवल जरूर लेकर जाते थे, लेकिन किसी रेस्तरां में खाने के गए तो फिर पल्लू ही सहारा होता था क्योंकि उस समय वहां टिश्यू पेपर नहीं दिए जाते थे। उनके यहां सिर्फ वॉश बेसिन होता था। आज के बच्चों की तरह हम भी हाथ जरूर धोते थे, और फिर चुपचाप जाकर मां के पल्लू से पोंछ लेते थे, वे इस बात से अनजान भी होती थीं, क्योंकि वह तो हमारी प्लेट में बचे वड़ा या इडली को खत्म करने में लगी होती थी ताकि कुछ भी बेकार न जाए। मुझे नहीं लगता कि आज के बच्चों को पता भी होगा कि पल्लू क्या होता है, क्योंकि उनकी मम्मियां कम ही साड़ी पहनती हैं। कम से कम, मैंने तो अपनी छह दिन की खाड़ी देशों के यात्रा के दौरान साड़ी पहने बच्चों को संभालती किसी मां को नहीं देखा।
पल्लू का मुख्य काम मां की साड़ी को गरिमा प्रदान करना था। लेकिन ये चूल्हे से गरम बर्तन उतारने के लिए एक पॉट-होल्डर का काम भी करता था। रोते बच्चों के आंसू पोंछने के लिए रूमाल बन जाता था, और कई मौकों पर मेरे गंदे कानों को साफ करने के काम भी आता था! कभी-कभी मैं ऐसे ही मुंह में मां के पल्लू का कोना दबाए टाइम-पास करता रहता था, तो फिर वह मेरे सिर पर एक हल्की सी ‘टपली’ लगा देती थी और कठोर होकर कहती थी “ऐसा मत करो।’ लेकिन उस “ना’ में प्यार और नसीहत का एक गजब का मिश्रण था। मुझे याद है कि ऐसे मौकों पर उनके चेहरे पर मातृत्व का एक गौरव झलकता था। मैंने देखा है कि मेरी मां अपने पल्लू का इस्तेमाल मेरी नवजात बहन को ढंकने के लिए भी करती थी। अपनी शैतानी भरी मस्ती के लिए जब मैं पिताजी से पिटने वाला होता था, तो मेरे छुपने का ठिकाना मां का वही पल्लू होता था। ठंडे मौसम में यह मां के हाथों को गर्म रखता था और गर्मियों में उनके और हम बच्चों के माथे पर छलक आईं पसीने की बूंदों को साफ करने के काम आता था। सुबह-सुबह यह पूजा के लिए सुगंधित फूलों की डलिया बन जाता था, फिर भगवान की तस्वीर को साफ करने का कपड़े की तरह काम आता था। फिर, रसोई के लिए लकड़ियां लाने का सहारा होता था तो साथ ही घर के दरवाजे पर आए सब्जीवाले से सब्जी लेने के लिए टोकरी बन जाता था। हम बच्चों के खिलौनों को लाने-ले जाने के लिए भी पल्लू से बढ़िया कैरी बैग कोई दूसरा नहीं था, लेकिन इन सब के बावजूद इसके कोने में बंधे ‘आने-दो आने’ कभी गुम नहीं होते थे। ये भरे बर्तनों को उठाने के काम आता था, और हमारे लिए भी झोली भरकर खुशियां ले आता था। कहना गलत नहीं होगा कि एक ममतामयी मां के लिए साड़ी का पल्लू किसी जादुई कालीन से कम नहीं था।
फंडा यह है कि  मैं दावे से कह सकता हूं कि मां के पल्लू के सुरक्षा भरे एहसास और उसके साथ जुड़ी ममतामयी यादों के बिना हर बचपन अधूरा है।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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