हमें तय करना है, हम किस दुनिया में रहना चाहते हैं और उसे वैसा बनाने के लिए विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होगी

‘शेफ, वेटर, मैनेजर और कई लोग, जिन्हें आप काम करते हुए देखते हैं या जो पृष्ठभूमि में रहकर काम करते हैं, इस महामारी के कारण सबसे ज्यादा परेशान हैं। इनकी मदद के लिए बाहर खाना खाएं।’ कोलकाता में 3 रेस्तरां चलाने वाले हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का इस हफ्ते दिखा यह विज्ञापन कम ग्राहकी के कारण अधिकांश रेस्तरां की दुर्दशा बताता है। देशभर के रेस्तरां में काम करने वाले हजारों लोगों को यह अपील मार्मिक लगेगी।

पर मुझे इस अपील से विदेश मंत्री एस. जयशंकर का इस गुरुवार को दिया वक्तव्य याद आ गया, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘कोरोना संकट के मद्देनज़र दुनिया एक ‘अभूतपूर्व चुनौती’ का सामना कर रही है, इसके कारण अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आज सबसे अधिक मूल्यवान उत्पाद ‘विश्वास’ बन गया है। आसियान-भारत नेटवर्क थिंक टैंक के गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने कहा कि महामारी से मुकाबला करने में कई देशों ने स्वार्थपूर्ण तरीके से काम किया। ‘दुनिया के सामने अर्थव्यवस्था की स्थिति ही मुद्दा नहीं है बल्कि समाज व शासन के स्तर पर चुनौती है। यह वास्तव में वैश्विक मामलों की भविष्य की दिशाओं और आगे की दुनिया की व्यवस्थाओं-अव्यवस्थाओं को लेकर बहस है, जिसमें हम रहने वाले हैं।’ ये दो घटनाएं मुझे 50 साल पहले मेरे बचपन में ले गईं।

मणि अय्यर नागपुर की सीताबर्डी की मेनरोड पर ताजे खाने के लिए प्रसिद्ध, विश्रांति गृह नाम के एक छोटे-से रेस्तरां के मालिक थे। इंटरव्यू के लिए जाने वाले युवा या जिनकी हाल ही में नौकरी लगी होती, लेकिन पहली तनख्वाह नहीं मिल पाने की स्थिति में उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते। ऐसे लोग रेस्तरां में बेहिचक आते, अपनी परिस्थिति अय्यर को बताते और जब तक कि उनको पहली तनख्वाह नहीं मिल जाती, भरपेट खाना खाते। उनसे कभी कोई सवाल नहीं पूछा जाता। कई लोगों ने इस भलाई का फायदा भी उठाया और बिना पैसे दिए भाग गए। पर मैंने, हमेशा मुस्कराने वाले, माथे पर विभूति और कुमकुम का छोटा टीका लगाए, उस बुजुर्ग को कभी गुस्सा करते हुए नहीं देखा। कभी ज्यादा हुआ तो लोगों को सिर्फ उनकी तेज आवाज सुनाई देती, जब वह एक लाइन में कहते कि ‘तुम सोचते हो कि जो तुमने किया वो सही है, हां?’ और मेरा यकीन मानिए कि सामने खड़े व्यक्ति के पास इसका कोई जवाब नहीं होता। और तुरंत अय्यर अपनी आवाज़ धीमी करके कहते ‘जाओ-जाओ, कॉफी पियो, इडली खाओ और इसके बारे में शांति से सोचो। जब तुम्हारा पेट भरा होगा, तो दिमाग भी अच्छा सोचने लगेगा।’

कई सालों बाद, जब मैंने उनसे पूछा कि ‘आपने कितने लोगों को मुफ्त में भोजन कराया होगा?’ तो उनका जवाब था कि ‘कौन जानता है?’ और फिर वह कैश काउंटर पर रखी भगवान ‘टेकड़ी गणेश’ की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहते कि ‘हमारे टेकड़ी गणेशजी के पास शायद इसका खाता होगा।’ उस दिन आखिरी बार मैं उनसे मिला।

पूरे 29 साल बाद जब मैं उस शहर में वापस लौटा, तो रेस्तरां भी गया। वहां देखा कि रेस्तरां की काफी जगह सड़क चौड़ीकरण में चली गई है, लेकिन उसका पहला माला बन गया है। और वहां मणि अय्यर वैसी ही सफेद शर्ट पहने माथे पर ‌विभूति-कुमकुम का टीका लगाए हमेशा की तरह मुस्करा रहे थे, लेकिन इस बार उनकी जगह टेकड़ी गणेश की तस्वीर के साथ लगी दूसरी तस्वीर में थी! समय के साथ इस रेस्तरां की ऊंचाई बढ़ गई और इस पर मेरा विश्वास भी दोगुना हो गया!

फंडा यह है कि हमें तय करना है, हम किस दुनिया में रहना चाहते हैं और उसे वैसा बनाने के लिए विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होगी।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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