जब तक ‘मेडिकल वैक्सीन’ नहीं मिल जाती तब तक इम्यूनिटी पाउडर जैसी ‘मेंटल वैक्सीन’ लेना जारी रखें


मेरे एक मित्र ने हाल ही में मुझे एक कार्टून भेजा, जिसमें डॉक्टर एक चिंतित मां को समझा रहे हैं कि ‘आपके बेटे को पीलिया नहीं है, जिसको लेकर आप डर रही हैं, पर यह उसके रोज़ाना के दूध में बहुत ज्यादा हल्दी मिलाने का परिणाम है!’
पिछले कुछ महीनों से कई भारतीय घरों में यह सुबह का दस्तूर बन गया है, जहां एक जग गर्म पानी में कोविड के प्रति इम्यूनिटी बढ़ाने वाले पाउडर की कुछ चम्मच मिला दी जाती हैं और चाय या कॉफी मांगने वाले किसी को भी सुबह खाली पेट ये पहला पेय दे दिया जाता है। यहां तक कि इसके कारण सुबह की पसंदीदा प्याली भी आधा घंटा देरी से मिलने लगी है। ऊपर जिक्र कार्टून घर की महिलाओं की अपने बच्चों और पति के प्रति जरूरत से ज्यादा परवाह को बयां करता है।


इन वैकल्पिक चीज़ों की लगातार बढ़ती मांग से फायदा उठाने वाली भारतीय उपभोक्ता कंपनियों की बढ़ती संख्या इस बात का सुबूत है कि कितने भारतीय इन इम्युनिटी बढ़ाने वाले पाउडर्स की ओर जा रहे हैं। यह सालाना 74 हजार करोड़ रुपए की इंडस्ट्री एक बड़ी सफलता रही है क्योंकि हम दृढ़ता से उन सभी दावों को मानते हैं कि सभी प्राकृतिक उपचार हमें किसी भी चीज़ से बचा सकते हैं


सुबह का यह रिवाज़ मुझे इस शुक्रवार याद आया, जब मैं महाराष्ट्रियन पैठणी सिल्क साड़ी केे उत्पादन व सेल के केंद्र, येवला जा रहा था। मैं जिस दुकान पर गया था वहां साड़ियों की कीमत 8 हजार से लेकर कुछ लाख तक के आधार पर कई फ्लोर थे। तब भी सैकड़ों लोग दुकान के बाहर इंतजार कर रहे थे। एेसा नहीं था कि खरीदार कम पैसे वाले और स्टैंडर्ड में कमतर थे क्योंकि पैठणी साड़ी सस्ती नहीं आती हैं। पर मेेरे लिए यह चौंकाने वाला था कि कम से कम 50 फीसदी खरीदार मास्क नहीं पहने थे, 20-25 प्रतिशत के मास्क उनकी ठुड्‌डी पर थे! जहां दुकानदार सबसे ज्यादा ध्यान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनने, हाथ धोने पर दे रहे थे, वहीं लोग इसके बिल्कुल उलट कर रहे थे।


मैंने अपने परिवार से जल्दी 15 मिनट में वह जगह छोड़ने के लिए कहा। लौटते समय मैं भोपाल में अपने एक साथी विनायक दुबे से बात कर रहा था, वो भी शुक्रवार को नजदीक के ऐतिहासिक शहर सागर जा रहे थे। अपनी कार में हवा चैक करवाने के लिए वह एक जगह रुके। उस जगह का मालिक बिना मास्क के बैठा था। जब उन्होंने उससे मास्क ना पहनने के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि पब्लिक प्लेस पर उसे पूरा दिन रहना पड़ता है, जहां कई लोग आते हैं, ऐसे में मास्क के कारण वह खुलकर बात नहीं कर पाता! याद रखें कि पंक्चर दुकान या पेट्रोल पंप पर सोशल डिस्टेंसिंग काफी मुश्किल है। तब उसने दावा किया कि अपने बचाव के लिए वह हर सुबह नहाने के बाद एक गिलास इम्युनिटी बढ़ाने वाला पाउडर पीता है और घर से निकलने से पहले भाप लेता है, घर पहुंचने के बाद फिर यही दोहराता है। उसके अनुसार इस ‘वैक्सीन’ (‘मेंटल वैक्सीन’ पढ़ें) में उसे महामारी से बचाने की ताकत है। ठीक उस समय जब देश में कोरोना के मामले 80 लाख व मौतें एक लाख 20 हजार पार कर गईं हैं, वैकल्पिक चिकित्सा उपायों की भूख और कोविड का इलाज के छद्मवैज्ञानिक दावे विवाद खड़ा कर रहे हैं।


फंडा यह है कि इम्यूनिटी पाउडर जैसी ‘मेंटल वैक्सीन’ लेना जारी रखें क्योंकि इनसे कोई नुकसान नहीं है और ये कुछ इम्यूनिटी तो बढ़ाती ही हैं, पर जब तक ‘मेडिकल वैक्सीन’ नहीं मिल जाती, तब तक सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और हाथ धोना भी उतना ही जरूरी है। यह हमारे देश को दूसरी लहर से बचाएगा, जो अधिकांश विकसित देशों को प्रभावित कर रही है।

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