मैनेजमेंट फंडा: शिक्षकों के लिए अपने निरीक्षण के आधार पर छात्रों का ‘गुरु’ बनने का समय है

अपने मंगलवार के लेख में मैंने एमएस धोनी के बारे में लिखते हुए कहा था कि उनपर बनी बायोपिक में उनके शिक्षक अंग्रेजी सुधारने को कहते हैं, जो उनकी भविष्य में मदद करेगी। बुधवार को, मेरे सुबह 4 बजे उठने से पहले ही मेरे फेसबुक पर एक पोस्ट थी जिसमें लिखा था, ‘वह उनके शिक्षक नहीं थे बल्कि यह बात उनके रेलवे ऑफिसर ने कही थी।’ फेसबुक पर जिसने वह कमेंट पोस्ट किया था, वह सही था क्योंकि वह बारीकी में और उस व्यक्ति के पदनाम पर चला गया था लेकिन उसकी भूमिका धोनी के जीवन में क्या थी, यह नहीं समझा था। पुराणों के अनुसार, जिनपर मैं विश्वास करता हूं, वह व्यक्ति जो सिर्फ जानकारी देता है उसे ‘अध्यापक’ कहते हैं, जो उसमें ज्ञान भी जोड़ दे उसे ‘उपाध्याय’ कहते हैं, जो कौशल भी दे, उसे ‘आचार्य’ कहते हैं, जो गहरी समझ प्रदान करे उसे ‘पंडित ’ कहते हैं और जो व्यक्ति विवेक या बुद्धिमत्ता दे उसे ‘गुरु’ कहा जाता है।

और दुर्भाग्य से इन पांचों पदों के लिए अंग्रेजी में एक ही शब्द है, ‘टीचर’! हो सकता है कि उनके पदनाम बदल गए हैं, जैसे लेक्चरर और प्रोफेसर, लेकिन उनसे हम जानकारी और ज्ञान की उम्मीद ही करते हैं। मुझे लगता है कि वे इस भूमिका से परे जा सकते हैं। और मेरे लिए वे रेलवे ऑफिसर किसी गुरु से कम नहीं थे क्योंकि वे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान के रूप में धोनी के भविष्य का अनुमान लगा पाए थे और इसी आधार पर उन्हें सलाह दी थी। मैं मानता हूं कि इस महामारी ने हर शिक्षक के लिए गुरू बनने का समय दिया है। चौंक गए? ये रहा मेरा तर्क। आज, शिक्षक ऑनलाइन क्लासेस के माध्यम से परिवारों के प्राइवेट स्पेस में आ गए हैं। इसलिए कई स्कूल शिक्षकों से ऑनलाइन क्लासेस के दौरान ज्यादा मिलनसार होने और छात्रों के घर आ रहे व्यवधानों को नजरअंदाज करने कह रहे हैं, जो अब नाश्ते की टेबल और बेडरूम में शिफ्ट हो गई हैं। शिक्षकों को उदार रहने कहा जा रहा है क्योंकि हर घर में चुनौतियां हैं। बीमार दादा-दादी, कामकाजी पैरेंट्स जिन्हें काम पर जाने के लिए तैयार होना है, स्कूल न जाने वाले छोटे भाई-बहन जो ऑनलाइन क्लास में साथ बैठना चाहते हैं, ये सभी उन सैकड़ों कारणों में शामिल हैं जो पीछे शोर पैदा करते हैं और बच्चों का इनपर नियंत्रण नहीं होता। यह बच्चे के लिए शर्मिंदगी भरा होगा अगर उन्हें बिना गलती के डांटा जाएगा।

हालांकि स्कूलों ने पैरेंट्स को भी कुछ गाइडलाइन दी हैं, ताकि वे ऑनलाइन क्लास में सहायक माहौल बना सकें लेकिन वे इसपर सख्ती नहीं अपना सकते क्योंकि वे जानते हैं कि सभी के पास पढ़ाई के लिए तय जगह नहीं होती। अब शिक्षक छात्रों के घरों में सुबह-सुबह ही प्रवेश कर रहे हैं, ऐसे में वे घर व्यवस्थित होने की उम्मीद नहीं कर सकते। स्कूल अब शिक्षकों को समझाइश दे रहे हैं कि वे बच्चे की क्लास के लिए पैरेंट्स से फॉर्मल कपड़ों में तैयार होने की उम्मीद न करें। व्यवधान तो होंगे ही, जो बच्चे की एकाग्रता भंग कर सकते हैं। यह शानदार समय है! शिक्षक को छात्र का हर पहलू जानने मिल रहा है। अगर शिक्षक हर दिन एक छात्र का भी निरीक्षण करे और उसके बारे में लिखे, तो वह पूरी क्लास के बारे में दो महीने में जान लेगा।
फंडा यह है कि यह हर शिक्षक के लिए अपने निरीक्षण के आधार पर किसी छात्र का दार्शनिक, मार्गर्शक, दोस्त और सलाहकार का बनने समय है, जैसे धोनी के रेलवे ऑफिसर गुरु ने किया था।

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