यह अकादमिक वर्ष पेरेंट्स के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मैं ऐसे बच्चे को जानता हूं जो खुश था कि उसे स्कूल नहीं जाना पड़ता और स्कूल रोज उसके पास आता है। चूंकि स्कूल आने-जाने का समय बचने लगा, उसने सोने के लिए अतिरिक्त समय की नई मांग की, जिसे माता-पिता को मानना पड़ा। यह उसके आलस की शुरुआत थी। जब उसकी कामकाजी मां दूर होतीं, तो धीरे-धीरे उसने कैमरा बंद कर, बैंडविथ का बहाना कर कम्प्यूटर से छेड़छाड़ शुरू की और स्टडी टेबल पर झपकी लेने लगा। धीरे-धीरे कम्प्यूटर के सामने बैठने की उसकी इच्छा खत्म होने लगी।

वह गुस्सैल और अवसादग्रस्त हो गया। कभी-कभी वह लॉगइन करने से ही मना कर देता। तबीयत का बहाना कर वह लगातार असाइनमेंट छोड़ने लगा। जल्द इसका महीने भर का स्कूलवर्क छूट गया। उसे टीचर नापसंद हो गईं क्योंकि वे अधूरे काम के बारे में पूछती थीं और फिर विषय और अंतत: स्कूल से ही चिढ़ हो गई। फाइनल ऑनलाइन टेस्ट मे वह फेल हो गया। लेकिन उसे अगली क्लास में प्रमोट कर दिया गया। अब उसके माता-पिता असमंजस में हैं कि यह प्रमोशन कितना अच्छा है और नई क्लास में उसका प्रदर्शन कैसा होगा।

यह परिस्थिति सिर्फ भारत नहीं, दुनियाभर में है। बच्चों का 2020-21 का पूरा अकादमिक वर्ष स्कूल जाए बिना बीत गया। दुनियाभर के कई बच्चे घर बैठकर स्कूल अटेंड करने की नई आजादी पाकर खुश थे। कई बच्चों ने अपना समय वीडियो क्लास में ध्यान देने की बजाय दोस्तों से ऑनलाइन चैटिंग में बिताया। सभी जानते हैं कि ऑनलाइन क्लास ने छात्रों की अटेंडेंस के पैटर्न और सीखने की क्षमता को प्रभावित किया है। इससे स्कूल तथा शिक्षकों से अलगाव दिखने लगा। मैं ऐसे कई बच्चों को जानता हूं जिन्होंने आठवीं में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया लेकिन उन्हें नौवीं में भेज दिया गया।

कुछ माता-पिता, जिनके बच्चों ने रिमोट लर्निंग में संघर्ष किया, चाहते हैं कि बच्चे उनकी क्लास रिपीट करें, लेकिन स्कूल इसके खिलाफ हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हर देश में सरकार स्कूलों को छात्रों को उसी कक्षा में रोकने नहीं दे रही है, जिसमें वे हैं, क्योंकि उसे आशंका है कि इससे सामाजिक और भावनात्मक मुश्किल और हमेशा के लिए स्कूल छोड़ने की आशंका बढ़ेगी, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में। लेकिन कुछ चिंतित माता-पिता और शोधकर्ताओं को लगता है कि स्कूलों को उन बच्चों को आगे बढ़ाने के संभावित नुकसान के बारे में भी सोचना चाहिए जो अकादमिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं है।

बेशक गैरहाजिरी से अक्सर सीखने में अंतर आता है। उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है और ज्यादा प्रतिशत पाने की बढ़ती स्पर्धा में कई बच्चे हाल के वर्षों में स्कूली परीक्षाओं में 100 फीसदी के करीब पहुंचने लगे हैं। ऐसे में छात्रों को 2020-2021 में हुए लर्निंग के नुकसान की भरपाई करनी होगी।

अगर हम एक और साल खोते हैं तो यकीन मानिए उनकी आधारभूत लर्निंग को मजबूत बनाने का दूसरा मौका नहीं मिलेगा। या तो बच्चों की गंभीर होने और अपनी पढ़ाई संभालने में सक्षम होने में मदद करें या काम से एक साल का ब्रेक लेकर बच्चों का आधार मजबूत करें। बच्चा भले ही इसकी गंभीरता न समझे क्योंकि वह उतना भविष्योन्मुख नहीं होता, लेकिन बतौर पैरेंट्स आपको यह समझना होगा।

फंडा यह है कि बच्चों का आधार मजबूत किए बिना उन्हें प्रमोट करना उनके भविष्य के लिए खतरनाक है। फैसला आपके हाथ में है कि आपको क्या करना है, अपने एक साल का वेतन खोना है या अपने बच्चे का पूरा कॅरिअर।

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