यह जीवन की दिशा बदलने और कुछ ऐसा सीखने या करने का वक्त है, जो आपको लगातार व्यस्त रखे

स्कूल न होने का मतलब सीख का रुकना और नौकरी न होने का मतलब काम न होना नहीं होता। इस साल अप्रैल में लॉकडाउन के बाद से कई मांएं 10 साल से कम उम्र के अपने बच्चों को व्यस्त रखने में संघर्ष कर रही थीं। ऐसी ही स्थिति ओडिशा के कामगारों की थी, जो अलग-अलग राज्यों से घर लौट आए थे और नहीं जानते थे कि अब क्या करना है। जुलाई 2020 में दोनों की स्थितियां बदल गई हैं। एक परियोजना के तहत न सिर्फ 700 बच्चे वर्चुअल दोस्त बन गए हैं, बल्कि आज वे नन्हे किसान बन गए हैं। वहीं बेरोजगार कामगारों ने कुदाल-फावड़ों से एक किमी लंबी नहर खोद दी है, जो उनके गृहनगर में 150 एकड़ जमीन की सिंचाई करेगी। ये रही उनकी कहानियां। पहली कहानी: चेन्नई की ईजोन इंडिया कंपनी के ‘माइक्रो-ग्नीन्स’ प्रोजेक्ट से देशभर में करीब 700 बच्चे जु़ड़े हैं। कंपनी स्कूली बच्चों के लिए, उनके ही साथ पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट करती है। पिछले पांच सालों से हाफ़िज़ खान और उनकी टीम हर अकादमिक सत्र शुरुआत में पहले दो महीनों के लिए चेन्नई के स्कूलों में जाते रहे हैं और बच्चों को छोटी जगहों में कुछ उगाने और उनका उपयोग करना सिखाते रहे हैं। वे कुछ ही स्कूलों में जा पाते थे। लेकिन लॉकडाउन ने इस प्रोग्राम को लाइव वॉट्सएप वीडियो सेशन में बदल दिया है, जिसमें दुनियाभर के 60-60 बच्चों के बैच होते हैं। आज 15 दिन के सेशन के बाद बच्चे धनिया, मेथी, हरी प्याज, जीरा और लहसुन जैसी कई चीजें उगाने लगे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि जब बच्चे अपनी फसल डाइनिंग टेबल पर लाते हैं तो वे पत्तियां खुद की सलीके से काटकर सलाद, अंडा भुर्जी और सैंडविच में डालते हैं। इससे उनकी खाना पकाने और स्वास्थ्यवर्धक खाने में भी रुचि बढ़ी है। जब उनकी फसल खाने में इस्तेमाल होती है, तो वे बिना किसी नखरे के खाते भी हैं, जो कि उन माता-पिता के लिए फायदेमंद है, जिन्हें बच्चों को हरी सब्जियां खिलाने में परेशानी होती है। दूसरी कहानी: भुवनेश्वर से 310 किमी दूर रानीपांगा गांव में तीन से चार फुट गहरी नहर, जो स्थानीय नदी से पानी लेकर करीब 159 एकड़ कृषि भूमि सींचने में मदद करेगी। गांव तक पानी लाने का पहला चरण 25 दिन की मेहनत के बाद 6 जुलाई को पूरा हो गया। अब छोटी नालियां बनाई जा रही हैं, जो अलग-अलग खेतों तक पानी ले जाएंगी। सफलता की इस छोटी कहानी के पीछे 30 प्रवासी कामगार हैं, जो अलग-अलग राज्यों से लौटे हैं और जिन्होंने खाली न बैठने का फैसला लिया। वे यह जानते थे कि ग्रामीण ज्यादातर मौसमी बारिश पर निर्भर रहते हैं और गांव में कोई विश्वसनीय जल स्रोत नहीं है। तभी उन्हें एक छोटी नदी मिली जो गांव से एक किमी दूर बहती है। उन्होंने ग्रामीणों से बात की और करीब 85 लोग मजदूरी कर योगदान देने तैयार हो गए। ग्रामीणों को लगता है कि प्रवासी मजदूरों का लौटना गांव के लिए वरदान साबित हुआ है क्योंकि उनके नेतृत्व और बाहरी दुनिया से मिले उनके ज्ञान के बिना यह परियोजना कभी सफल नहीं हो पाती।

फंडा यह है कि : यह जीवन की दिशा बदलने और कुछ ऐसा सीखने या करने का वक्त है, जो आपको लगातार व्यस्त रखे। आखिरकार जीवन में कोई सीख कभी बर्बाद नहीं जाती।

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