यह धरती के घाव भरने के लिए भी योजना तैयार करने का समय है, ताकि हम अपने बच्चों को बिना मास्क के मुस्कुराते देख सकें

अनलॉक 4 आ चुका है। मैं कल्पना कर रहा था कि तब क्या होगा जब स्कूल खुलेंगे और हम बच्चों को लेने जाएंगे और अचानक सैकड़ों स्कूली बच्चों के चमकती आंखों वाले चेहरों की जगह मास्क से ढंके चेहरे हमारा अभिवादन करेंगे। दूर से आते बच्चों में हमें खोजना होगा कि हमारा बच्चा कौन-सा है। क्या बच्चों के लिए हमने ऐसी ही जिंदगी की कल्पना की थी? इसे जलवायु परिवर्तन कहें या प्रकृति के दोहन का इंसानी लालच। लेकिन हकीकत यह है कि हम मुसीबत में हैं। और यह समय है कि हम सार्वजनिक हित के लिए छोटी और लंबी अवधि की योजनाएं बनाएं।

इस मंगलवार एक स्पेशल फ्लाइट ऑपरेशन से श्रीनगर में 60 वर्षीय कोविड संक्रमित महिला के लिए दक्षिण में 3000 किमी दूर, बेंगलुरु से ब्लड प्लाजमा के रूप में मदद और उम्मीद आई। मरीज के परिवार द्वारा आपातकालीन कॉल के कुछ ही घंटों में बेंगलुरु में ठीक हुए एक मरीज से प्लाजमा की व्यवस्था की गई और दिल्ली होते हुए कनेक्टिंग फ्लाइट से प्लाजमा श्रीनगर भेजा गया। प्लाजमा यूनिट्स की पूरी एयरलिफ्टिंग का समन्वय बेंगलुरु के एचसीजी कैंसर हॉस्पिटल के डॉक्टरों की टीम ने किया। आठ घंटे के सफर के बाद प्लाजमा मंगलवार को सफलतापूर्वक श्रीनगर के सरकारी अस्पताल में पहुंचा दिया गया।

इंडीगो एयरलाइन द्वारा ब्लड प्लाजमा को ले जाने के लिए तैयार किए गए भारत के पहले एयर कॉरीडोर का कोविड-19 मरीजों के इलाज में काफी असर पड़ेगा। हाल ही में अमेरिका के एफडीए ने प्लाजमा थैरेपी के इस्तेमाल को अनुमति दे दी है। इस तरह एविएशन, मेडीकल और कोऑर्डिनेशन टीमों के इतिहास में एक जान बचाने का नया अध्याय जुड़ गया है। इसे मैं कहता हूं छोटी अवधि की योजना, जिसका त्वरित, असरदार और समय पर लागू होना जरूरी है।

बीतते दिनों के साथ ऐसी और भी समस्याएं आ सकती हैं और मुझे भरोसा है कि हम इन चुनौतियों को सामना कर पाएंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम धरती को बेहतर बनाने की लंबी अवधि की योजना को भूल जाएं। यही कारण है कि कक्षा ग्यारहवीं की 16 वर्षीय छात्रा गीता उगिन अशोक और उसकी 14 वर्षीय बहन सजीता के प्रयास ने मेरा ध्यान खींचा। इन्होंने तमिलनाडु में अपने गृहनगर कोडईकनल को और हरा-भरा बनाने का बीड़ा उठाया है। अपनी रोज की ऑनलाइन क्लासेस के बाद, वे मिलकर जामुन, पंगम, सिल्वर ओक, ग्लोरिसा, नीम और रुद्राक्ष जैसे स्थानीय पेड़ के बीजों की सीड बॉल (बीज की गेंद) बनाती हैं। ये सभी सदाबहार पेड़ हैं जो मैदानी इलाकों से लेकर समुद्रतल से 2000 फीट की ऊंचाई पर भी फल-फूल जाते हैं।

उन्होंने अपना प्रोजेक्ट अप्रैल अंत में शुरू किया था और अब तक 50 हजार बॉल बना चुकी हैं। सोशल मीडिया से कुछ टिप्स के साथ उन्होंने यह काम खुद ही सीखा और उन्होंने मदुरै, त्रिची और कोयंबटूर के रिश्तेदारों से भी बीज भेजने को कहा। उन्हें महसूस हुआ कि पिछले चार दशकों में 61% घास के मैदान नष्ट हो गए हैं। साथ ही यूकेलिप्टस ने कोडईकनल के स्थानीय पेड़ों को नुकसान पहुंचाया है। उनकी योजना वहां मॉनसून शुरू होने से पहले एक लाख सीड बॉल्स फेंकने की है। वे छोटे-छोटे बैच में इन्हें बनाकर भेजती हैं ताकि बीज सूखें न।

फंडा यह है कि जहां मौजूदा समस्याओं को छोटी अवधि की योजनाओं से हल करने की जरूरत है, वहीं यह धरती के घाव भरने के लिए भी योजना तैयार करने का समय है, ताकि हम अपने बच्चों को बिना मास्क के मुस्कुराते देख सकें।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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