यह बच्चों और बुजुर्गों दोनों के लिए ही, भुला दी गई ‘पर्सनल केयर‘ और सेवाओं के कस्टमाइजेशन का फिर ‘श्री गणेश’ करने का समय है

लंबे समय से दुनियाभर की सुप्रबंधित कंपनियों ने उत्पादों को कस्टमाइज (पसंद के आधार पर बदलाव की सुविधा) करने की बजाय वैश्विक स्टैंडर्ट उत्पाद देना शुरू कर दिया है, जो आधुनिक, उपयोगी व विश्वसनीय हैं और कम कीमत के हैं। फिर वे तकनीक का इस्तेमाल कर साधनहीन लोगों के बीच आधुनिकता के आकर्षण के प्रति उत्सुकता पैदा करती हैं। यह इंसानी प्रवृत्ति है कि वह सभी चीजें पाना चाहता है, जो उसने तकनीकों के माध्यम से सुनी, देखी या अनुभव की हैं। लेकिन ये उदाहरण बताते हैं कि इस कोरोना काल में निजी अनुभूति के साथ सेवाओं का कस्टमाइजेशन ज्यादा कारगर सिद्ध हो रहा है।

उदाहरण 1: कोरोना के बाद से ज्यादातर स्कूल ऑनलाइन हो गए हैं और मोबाइल फोन व लैपटॉप रिसायकल कर साधनहीन परिवारों तक तकनीकी मदद पहुंचाने के प्रयास हो रहे हैं। इस तकनीकी उथल-पुथल के बीच एक बदलाव हो रहा है, जिसपर किसी का ध्यान नहीं गया। फंड और ऑनलाइन लर्निंग से जुड़ी कमियों के कारण बड़ी संख्या में कई ग्रामीण और छोटे शहरों के छात्र प्राइवेट से सरकारी स्कूलों में चले गए। ऐसा पहली से आठवीं कक्षाओं में ज्यादा हो रहा है। माता-पिता सोच रहे हैं कि ऑनलाइन क्लासेस के लिए इतनी फीस देना सही नहीं है। दूसरी तरफ, वह देख रहे हैं कि सरकारी स्कूल पढ़ाने के नए तरीके अपना रहे हैं और किसी पर ऑनलाइन क्लासेस का दबाव नहीं बना रहे।

कर्नाटक सरकार का ही उदाहरण ले लीजिए जो ‘विद्यागमा’ नाम का निरंतर अध्ययन कार्यक्रम चला रही है, जहां खेतों, मंदिरों, सामुदायिक भवनों और खेल मैदानों में छोटे समूहों में क्लासेस चल रही हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में प्राइवेट स्कूल अब भी निष्क्रीय हैं। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता उन्हें भौतिक रूप से शिक्षक की देखरेख में छोड़ने में खुश हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि छमराजानगर नाम के जिले में ही, वहां के शिक्षा विभाग के मुताबिक, 800 छात्र प्राइवेट से सरकारी स्कूलों में चले गए। कई जगहों पर ऐसे ही बदलाव की खबरें हैं, जहां ज्यादातर छात्र इस कदम के पीछे वित्तीय समस्या या ऑनलाइन क्लास में शामिल होने में असमर्थता को कारण बता रहे हैं। यह देखा गया है कि यह बदलाव धीमा है क्योंकि स्कूल बंद हैं, शिक्षक फील्ड पर हैं और उन पैरेंट्स की जिज्ञासाओं का जवाब देने के लिए कोई उपलब्ध नहीं है, जो बच्चों को सरकारी स्कूल में डालना चाहते हैं। इसलिए हेडमास्टरों को स्कूल के ऑफिस में बैठने कहा गया है, ताकि वे पैरेंट्स को जवाब दे सकें।

उदाहरण 2: इन दिनों केवल स्कूली बच्चे ही ऑनलाइन क्लास नहीं ले रहे हैं। अपने साप्ताहिक ‘लेक्चर्स’ के लिए हैदराबाद के वरिष्ठ नागरिक भी कम्प्यूटर पर लॉगइन कर रहे हैं, जहां वे एक क्लिक पर बिल भरना या सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में दोस्तों से वीडियो चैट के लिए कैमरा चालू करना सीखते हैं। उनके लिए यह फिर से आत्मनिर्भर होने जैसा है। यह सब गूगल के सहयोग से हेल्पएज इंडिया द्वारा केवल बुजुर्गों के लिए शुरू किए गए कार्यक्रम के कारण हो रहा है।

बुजुर्ग पेमेंट गेटवेज़ का इस्तेमाल, ऑनलाइन ऑर्डर, कैब बुकिंग, सोशल मीडिया और पेमेंट एप्स के इस्तेमाल में सुरक्षित रहना सीख रहे हैं। रोचक यह है कि उन वरिष्ठ नागरिकों में मीटिंग एप्स भी मशहूर हो रहे हैं, जो कभी आमने-सामने साथ समय बिताना पसंद करते थे।

फंडा यह है कि यह बच्चों और बुजुर्गों दोनों के लिए ही, भुला दी गई ‘पर्सनल केयर‘ और सेवाओं के कस्टमाइजेशन का फिर ‘श्री गणेश’ करने का समय है।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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