यह रहा ग्रामीणों के लिए एक बिजनेस आइडिया

महामारी ने इंसान की तीन जरूरतें सबसे ऊपर ला दी हैं- सुरक्षा, बचाव और जगह। पहली दो चीजें ऐसी हैं, जिनका ध्यान सभी खुद ही रखते हैं, वहीं आखिरी चीज उन लोगों के लिए व्यावसायिक विकल्प खोलती है, जिनके पास किराये से देने के लिए जगह है। आप क्या कहेंगे जब कई भारतीय एयरपोर्ट्स पर एक भी व्यावसायिक गतिविधि न हो रही हो लेकिन उनके रिटायरिंग रूम और डोरमिटरीज अच्छा बिजनेस कर रही हों? कोलकाता एयरपोर्ट का ही उदाहरण ले लीजिए। कनेक्टिंग फ्लाइट्स के बीच लंबे अंतराल और संक्रमण के डर के कारण यात्री रात या वह लंबा समय अलग कमरे में गुजार रहे हैं, जो उन्हें सुरक्षा और बचाव दे रहा है।
पहले लोग कनेक्टिंग फ्लाइट्स पकड़ने से पहले एक दिन या रात अपने रिश्तेदारों के पास रुक जाते थे। लेकिन आज उनकी इस बदलती मानसिकता का असर सभी 23 कमरों और 10-10 बिस्तरों वाली डोरमिटरीज पर दिख रहा है, जो न सिर्फ भरी हुई हैं बल्कि किसी-किसी दिन अधिकारियों को यात्रियों को न कहना पड़ रहा है। वह भी तब, जब कोलकाता जैसे एयरपोर्ट्स में महामारी के पहले 500 फ्लाइट्स होती थीं और अब सिर्फ 110 फ्लाइट्स हैं, जबकि यात्रियों की संख्या 60,000 से घटकर 14,000 हो गई है। इसका अंदाजा लगा सकते हैं कि जब फ्लाइट्स की संख्या बढ़ेगी तो कितनी मांग होगी। ऐसा नहीं है कि सिर्फ शहरों में और केवल सफर के दौरान लोग जगह तलाश रहे हैं। आज, महामारी के 5 महीनों बाद, हम देख सकते हैं कि कई लोग बड़े व प्रमुख शहरों से गांव चले गए हैं ताकि खुद के लिए निजी जगह तलाश सकें।
शुरुआत में मुंबई की कई कंपनियों ने, जिन्हें मैं जानता हूं, स्टाफ से शहर न छोड़ने को कहा था, इस उम्मीद में कि चीजें कुछ हफ्तों में सामान्य हो जाएंगी। लेकिन अब पांच महीने हो चुके हैं और स्थिति जल्द सामान्य होती नहीं दिखती। अगर दिसंबर 2020 तक कोई वैक्सीन आता भी है तो इसे सभी तक पहुंचने में 15 महीने और लगेंगे। इसलिए कुछ कंपनियों ने वर्क फ्रॉम एनीव्हेयर (डब्ल्यूएफए) यानी कहीं से भी काम को अपना लिया है। कई मालिकों को अहसास हुआ कि वे इस मुश्किल समय में अपने कर्मचारियों को निश्चितता नहीं दे सकते इसलिए उन्हें स्पष्टता देना ज्यादा बेहतर है। कर्मचारियों से डब्ल्यूएफए करने को कहा गया है और वे पहले ही अपने गांव जा चुके हैं जहां दो चीजें उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़क और ऑफिस से जुड़े रहने के लिए अच्छी इंटरनेट स्पीड।
जिन लोगों ने दूसरा घर खरीदा था और वह सालों से बंद पड़ा था, वे अब इस जगह का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। ऐसे गांव, जो पहले कोविड केयर सेंटर बनाने की योजना बना रहे थे, वे अब आईटी पेशेवरों को लुभाने के लिए सर्वसुविधायुक्त छोटे फार्म हाउस की योजना बना रहे हैं। उन्हें यह आइडिया पुणे के पास स्थित टाउनशिप आम्बी वैली सिटी से मिला, जहां बड़े पैमाने पर ऐसा बदलाव दिख रहा है। कई कंपनियां अब स्थायी रूप से चुनिंदा कर्मचारियों को वर्क-फ्रॉम-होम/एनीव्हेयर की सुविधा दे रही हैं, ऐसे में पेशेवर बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए शहरी जीवन की तुलना में ग्रामीण जीवन चुन रहे हैं।तेजी से प्रवासन हो रहा है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। वे लौटेंगे लेकिन जल्द नहीं।
फंडा यह है कि जब तक वैक्सीन उनके घर तक नहीं आ जाता, शहरों के नजदीक रह रहे ग्रामीणों के पास अपनी जगह किराये पर देकर पैसा कमाने का बड़ा अवसर है। तुरंत ऐसा कीजिए, इससे पहले कि कोई और आगे निकल जाए।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [[email protected]]

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