व्यवहार में बदलाव, संस्कृति में बदलाव से आता है, अगर आप अपने शहर के व्यवहार में बदलाव देखना चाहते हैं तो शहर की संस्कृति में बदलाव लाने की कोशिश कीजिए

हम में से ज्यादातर पैदल यात्रियों (पेडेस्ट्रियन) का सिग्नल हरा होने पर जेब्रा क्रॉसिंग पर चलते हैं। लेकिन कोई उस सिग्नल में बनी इंसान की आकृति पर ध्यान नहीं देता। वह आकृति हमेशा ट्राउजर पहने एक व्यक्ति को दर्शाती है, जिसका मतलब है कि वह पुरुष है। मैं हमेशा सोचता था कि महिला कब सड़क पार करेगी? उस क्रॉसिंग पर महिला की आकृति क्यों नहीं है? मैंने कई दशक पहले अपने संपादकीय लेखों में इस पूर्वाग्रह के खिलाफ आवाज उठाई थी। मैंने तर्क दिया कि अगर महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा देना है, तो हमारे जैसे शहर निर्माताओं को व्यावहारिक बदलाव लाने के लिए छोटे सांस्कृतिक बदलाव लाने होंगे। शहरी योजनाकार, जो मेरे आलोचक भी थे, कहते थे कि ऐसा करना सतही प्रयास ही होगा, जिससे लैंगिक असमानता की समस्या दूर करने में बहुत मदद नहीं मिलेगी, खासतौर पर भारत जैसे देश में। यह केवल प्रतीकात्मक होगा और महिलाओं को अत्याचारों से नहीं बचाएगा।

मुझे लगता है कि यह एक ही शहर के दो अलग-अलग लोगों की तुलना कर इस नीतजे पर पहुंचने जैसा है कि शहर का व्यवहार कैसा है। यह बहुत आम हो गया है कि लोग फल खरीदते समय विक्रेता से मास्क पहनने और खरीदारों के लिए सैनिटाइजर रखने को कह रहे हैं। उसी शहर में कुछ अन्य लोग शराब की दुकान के बाहर, एक-दूसरे के नजदीक, मास्क को नीचे किए हुए खड़े रहते हैं। कुछ तो छींकते भी हैं। लोगों के दो समूहों के ये विपरीत व्यवहार उस शहर की संस्कृति परिभाषित नहीं कर सकते।

वापस आते हैं सिग्नल वाले मुद्दे पर। हमारे देश में ज्यादातर शहरों में पैदल यात्रियों को महत्व नहीं देते। पेडेस्ट्रियन सिग्नल चालू होने पर भी पुलिसवाले गाड़ी वालों को जाने देते हैं, मुख्यत: इसलिए क्योंकि तब वहां पैदल यात्री नहीं होते और उन्हें अपने जंक्शन पर ट्रैफिक का फ्लो बनाए रखने का निर्देश होता है। दोनों ही मामलों में जब पैदल यात्रियों के लिए तय किए गए समय में भी वर्दी वाले अधिकारी उनकी अनदेखी करते हैं, ऐसे में पुलिसवाले की अनुपस्थिति में गाड़ी वाले भी ट्रैफिक सिग्नल पर पैदल यात्रियों को महत्व नहीं देते। यूरोपियन शहरों की संस्कृति यह है कि ‘हर गाड़ी वाला कहीं न कहीं पैदल यात्री भी है, इसलिए उन्हें प्राथमिकता दी जाए’। यही कारण है कि वहां पेडेस्ट्रियन सिग्नल चालू होने पर गाड़ी वाले कभी गाड़ी नहीं बढ़ाते। यह सांस्कृतिक बदलाव है, जो वहां के लोगों में व्यावहारिक बदलाव लाया।

यही कारण है कि मुझे बहुत खुशी हुई जब पिछले हफ्ते मुंबई देश का पहला ऐसा शहर बना जिसने 240 पेडेस्ट्रियन सिग्नल्स पर पुरुष आकृतियों की जगह महिला आकृतियां लगाने का फैसला लिया। 120 सिग्नल्स पर पहले ही ट्राउजर्स की जगह त्रिकोण फ्रॉक लगा दी गई है।

स्विट्जरलैंड में जेनेवा और जर्मनी में ड्रेसडेन, ज़्विको जैसे शहरों में संकेतकों पर पुरुष आकृतियों के साथ महिला आकृतियां भी हैं। इनमें सबसे मशहूर है चोटी वाली महिला आकृति, जिसे ‘सोफी’ कहते हैं।

ऐसे बदलाव महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध नहीं रोकेंगे, इस तर्क में कोई वजन नहीं है क्योंकि आपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति का वैसे भी असामान्य व्यवहार होता है, इसलिए ऐसे बदलावों से उसके व्यवहार में बदलाव लाने का सवाल ही नहीं उठता। उन्हें संभालने के लिए अलग से कानूनी तंत्र है।

फंडा यह है कि अगर आप अपने शहर के व्यवहार में बदलाव देखना चाहते हैं तो शहर की संस्कृति में बदलाव लाने की कोशिश कीजिए।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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