शिष्टाचार ‘चमकीले दिन की उम्मीद’ जैसा हो गया है!

मैं मप्र के ग्वालियर की यात्रा पर था, तभी मेरे फोन पर तीन वॉट्सऐप मैसेज, तीन अलग-अलग लोगों से मिले लेकिन ये सभी निहितार्थ की दृष्टि से एक-दूसरे के पूरक थे। पहले मैसेज में लिखा था ‘चारों तरफ बारिश के नजारे के साथ, सूर्य दर्शन के लिये प्रतीक्षारत’। दूसरे में एक वीडियो था, जिसमें केबीसी शो में हॉट सीट पर बैठा एक व्यक्ति अमिताभ बच्चन से पूछ रहा कि, वे हमेशा महिला प्रतियोगियों की इतनी सहायता क्यों करते हैं (वह दृश्य जिसमें अमिताभ स्वयं उठकर हाथ थामते हैं और महिला प्रतियोगियों को हॉट सीट पर बैठने में मदद करते हैं) लेकिन जब कोई पुरुष आता है तो वे विपरीत शिष्टता दिखाते हुए सीधे अपनी सीट पर क्यों चले जाते हैं? यह बिल्कुल स्पष्ट था कि पुरुष प्रतियोगी इस महान अभिनेता की खिंचाई करके ज्यादा से ज्यादा दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचना था, लेकिन इस प्रश्न को कोई भी व्यक्ति मासूमियत के साथ भी पूछ सकता है क्योंकि बदलते वक्त के साथ शिष्टाचार एक ऐसा शब्द है जिसे अच्छी तरह परिभाषित करने की जरूरत है।
और, अपने साथियों और समाज के प्रति एक बुनियादी शिष्टाचार जताने का ही सीधा प्रभाव यह होता है कि यह सभी के लिए ‘काश, धूप खिली होती’ वाली उम्मीद की तरह बन जाता है। हालांकि बारिश हो रही हो या धूप खिली हो, मैं अपनी यात्रा कभी नहीं टालता। और मैंने अनुभव किया है कि हमें विमान की बजाय ट्रेन यात्रा में ज्यादा शिष्टाचार के दर्शन होते हैं। आइए, मैं आपको अपने अनुभव को उदाहरण से समझाता हूं। आजकल विमान में ‘इकोनॉमी क्लास’ के बहुत से यात्रियों की इच्छा ‘प्रीमियम इकोनॉमी’ वाले हिस्से में बैठने की होती है जो कि एक नई क्लास है। संभवत: इसका उद्देश्य अमीर और अमीरों से थोड़े कमजोर (वास्तविक अमीर नहीं)-दोनों वर्गों के लोगों के बीच के अंतर को कम करने की है। इस नई क्लास वालों को ज्यादा आराम, ज्यादा सुविधाएं और कुछ प्रीमियम सेवाएं ‘इकोनॉमी क्लास’ से थोड़े से ज्यादा लेकिन प्रीमियम से काफी कम दामों पर मिलती है। इसी वजह से इसका नाम ‘प्रीमियम इकोनॉमी’ रखा गया है। मिलेनियल पीढ़ी की जीवनशैली में यात्राएं एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है क्योंकि वे यात्राओं के अनुभव को एक खर्च से ज्यादा एक निवेश के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि विमान कम्पनियां भी फ्लाइट में सीटों की 40 से 45 कतारों को अलग-अगल क्लास में बांटकर यात्रियों को स्वयं को ‘एक्सक्लूसिव’ होना महसूस कराती है और पैसा कमाती है। और, मुझे लगता है कि बिजनेस की इस रणनीति में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन मेरा प्रश्न यह है कि जब इसके साथ ‘इकोनॉमी क्लास’ जुड़ा हुआ है और यह एक ही प्लेन में होती है तो फिर यह बाकियों से श्रेष्ठ कैसे हो सकती हैं? शनिवार के दिन के अनुभव की बात करूं तो मैंने इस ‘प्रीमियम इकोनॉमी’ क्लास के एक यात्री को ‘इकोनॉमी क्लास’ की एक बुर्जुग यात्री को इस कारण से लताड़ते हुए देखा क्योंकि वह अनजाने में ही उसे टॉयलेट में चली गईं थी जो इस ज्यादा पैसा चुकाने वालों के लिए निर्देशित था। मुझे जो तीसरा वाट्सऐप वीडियो मिला, उसका शीर्षक था ‘टिकट विदऑउट अ सीट’ और इसने मेरे विचारों का बहुत शक्ति दी। यह वीडियो इस हफ्ते बहुत वायरल हुआ। यह एक बूढ़े आदमी की कहानी दिखाई गई है जो पांच घंटे की यात्रा करने के लिए छड़ी के सहारे एक बस में सवार होता है। बस पूरी भरी होती है और जब बूढ़ा आगे बढ़ता है तो सीट पर बैठा हर एक यात्री उसकी ओर न देखकर अपनी नजरें घुमा लेता है ताकि उन्हें अपनी सीट उसे न देनी पड़े। अचानक एक युवती सीट से खड़ी होती है और बूढ़े को अपनी सीट दे देती है। बूढ़ा यात्री कहता है- ‘मेरा टिकट बिना सीट वाला है।’ युवती जवाब देती है, ‘मेरा भी वैसा ही है, आप असली यात्री के आने तक सीट पर आराम से बैठिए’ और उसे बिठा देती है। कुछ देर बाद टिकट निरीक्षक आता है और देखता है कि सीट पर बैठे बूढ़े आदमी को उस सीट पर बैठने की पात्रता नहीं है। लेकिन वह युवती निरीक्षक की ओर आंखों से इशारा करती है और उसे अपना टिकट देती है जिस पर उसी सीट का नंबर लिखा होता है, जिस पर बूढ़ा आदमी बैठा होता है।
निरीक्षक इस युवती के करुणा भरे शिष्टाचार को देखकर पसीज जाता है और उसे अपनी सीट देने की पेशकश करता है क्योंकि युवती को भी पांच घंटे की यात्रा करनी होती है। वह युवती इस पेशकश को स्वीकार कर लेती है, और अपनी दोनों बैसाखियां संभालती है और निरीक्षक की सीट की ओर बढ़ जाती है। और, इस समय आपको इस वीडियो में बाकी यात्रियों के चेहरे देखने चाहिए। इस तरह यह फिल्म एक संदेश के साथ खत्म हो जाती है कि- असली करुणा वह है जब आप उस चीज को देने के लिए तैयार होते हैं जिसकी आपको स्वयं भी बहुत जरूरत होती है।’
फंडा यह है कि कि असली शिष्टावार और करुणा की भावना अब ‘काश, धूप खिली होती’ वाली उम्मीद जैसे बन गए हैं और ऐसा होना वाकई हमारे समाज के लिए घातक है।

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