सबसे अधिक वंचित कुछ लोगों की ज़िंदगी भी रोशन करना चाहते हैं तो बस उन्हें जरा-सा बेहतर रास्ते की ओर धकेलें

Management Funda by N. Raghuraman

मुझे याद नहीं कि बचपन में मेरे इलाके में किसी बिल्डिंग में कोई चौकीदार होता था, क्योंकि हमें जरूरत ही नहीं पड़ती थी। इसका मतलब यह नहीं है कि तब चोरी या लूट नहीं होती थीं। लेकिन किसी को जरूरत महसूस नहीं होती थी कि एक व्यक्ति को दिन-रात बाहर खड़े रहने की नौकरी देकर व्यवधान पैदा किया जाए। आज बिना चौकीदार और सीसीटीवी कैमरा वाली बिल्डिंग ढूंढना मुश्किल है।

जब कोविड के दौरान आना-जाना कम हुआ तो इन चौकीदारों पर कम दबाव था और उन्होंने मोबाइल पर टीवी सीरियल व फिल्में देखना शुरू कर दिया। एक दिन मैंने देखा कि चौकीदार 2008 में रिलीज हुई रामायण में डूबा हुआ था, जिसमें भगवान राम की भूमिका गुरमीत चौधरी ने निभाई, जो बाद में जाना-पहचाना नाम बन गए। मैं उसके पास गया और बोला, ‘शो बिजनेस से जुड़ने से पहले यह हीरो कोलाबा, मुंबई के एक स्टोर में चौकीदार था।’

उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे कह रहा हो, ‘कुछ भी… अपना काम करो, मुझे डिस्टर्ब मत करो।’ मैंने उससे इतना ही कहा, ‘मेरा विश्वास नहीं है तो गूगल चाचा पर चेक कर लो।’ तीन घंटे बाद जब मैं लौटा तो इसी चौकीदार ने सलाम करते हुए कहा, ‘सर, मैं भी कुछ बनना चाहता हूं।’ मैंने कहा, ‘अपना ध्यान मोबाइल से हटाओगे, तो एक दिन जरूर कुछ बनोगे।’ पिछले हफ्ते मैं उसी बिल्डिंग में गया और उस चौकीदार के बारे में पूछा तो सुपरवाइजर ने मुझे बताया कि उसे किसी फिल्म स्टूडियो में नौकरी मिल गई है। मैं खुश था कि वह अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है।

मैं यह सोच रहा था कि हम ऐसी छोटी पहल क्यों नहीं कर सकते, जो कई लोगों को सपने पूरे करने का रास्ता दिखाए। तब मुझे पुणे में सोहम ट्रस्ट चलाने वाले डॉ. अभिजीत सोनावने के बारे में पता चला। वे यहां अपनी पत्नी के साथ बेघर लोगों का मुफ्त इलाज करते हैं।

जब उन्हें एक मेडिकल पेशेवर ने करीब 2500 खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड दिए, तब सोनावने दंपती को इन्हें उन भिखारियों में बांटने का विचार आया, जो इन्हें इच्छुक ग्राहकों को बेच सकें। दीपावली से 10 दिन पहले इन कार्ड को चुने गए समूहों द्वारा पुणे के पुराने शहर में विभिन्न हिस्सों में आकर्षक दामों पर बेचा गया, जिससे उन्हें आय का एक स्थिर साधन मिला। उनमें से कई ने कहा कि उनके अंदर आगे भी ऐसे और काम ढूंढकर लगातार करते रहने की इच्छा जागृत हुई है।

इस पहल ने उन 25 भिखारियों के लिए न सिर्फ रोज से थोड़ा ज्यादा कमाने का मौका दिया, बल्कि वे ऐसी जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित हुए हैं, जिसमें वे नौकरी पाने और अपनी कष्टभरी परिस्थितियों से निकलने के लिए नौकरी पाने की हर संभव कोशिश करेंगे।

इस 48 वर्षीय भिखारी का ही उदाहरण ले लीजिए, जिसका मैं नाम नहीं देना चाहता क्योंकि इस दीवाली के बाद से वह भिखारी नहीं रहा। वह लॉकडाउन के पहले इलाज के लिए पुणे आया था। पैरों और पीठ पर घावों के कारण उसके लिए चलना भी मुश्किल था। उसे उम्मीद थी कि पुणे के इलाज से उसकी कुछ मदद होगी, लेकिन लॉकडाउन की घोषणा ने स्थिति बदतर कर दी।

जब कोई विकल्प नहीं बचा तो उसने भीख मांगना शुरू कर दिया। उसने इसे ही अपनी नियति मान लिया। लेकिन जब डॉ. सोनावने ने उसे पहले मुफ्त इलाज और बाद में बेचने के लिए ग्रीटिंग कार्ड दिए, तो उसे यह मौका मिलने की बहुत खुशी हुई। आज शनिवारवाड़ा में उसका ठेला हर सुबह बाकी दुकानों से काफी पहले खुल जाता है।

फंडा यह है कि अगर आप सबसे अधिक वंचित कुछ लोगों की ज़िंदगी भी रोशन करना चाहते हैं तो बस उन्हें जरा-सा बेहतर रास्ते की ओर धकेलें। क्या पता, यह उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए रोशन कर दे।- एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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