समय आ गया है जब आपके परोपकारी काम में कुछ व्यावहारिकता भी होनी चाहिए ताकि उसका असर लंबे समय तक रहे

आपको महाभारत की यह घटना याद है? संजय पांडवों से मिलकर लौटते हैं लेकिन जब धृतराष्ट्र उनसे पूछते हैं कि कृष्ण और पांडवों ने क्या कहा, तो संजय कहते हैं कि वे कल राजसभा में यह बताएंगे। संजय का फैसला सही था क्योंकि अगर धृतराष्ट्र संजय के शब्दों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते तो नतीजा युद्ध हो सकता था, जिसका दोष संजय पर आता। साथ ही, यह भी जरूरी था सभा में उपस्थित बुजुर्ग और बुद्धिमान लोगों को पता चले कि क्या हुआ था। इसलिए संजय ने समाचार को अगले दिन के लिए बचाकर रखा।

व्यथित धृतराष्ट्र सो नहीं पाते और विदुर को बुलाते हैं। विदुर बद्धिमान हैं और उनका व्यवहार सरहानीय भी है। उनके आने पर धृतराष्ट्र पूछते हैं कि वे सो क्यों नहीं पा रहे और डरे हुए क्यों हैं? विदुर तुरंत धृतराष्ट्र से कह सकते थे कि वे पुत्रों के प्रति अतिलगाव के कारण गलत फैसले ले रहे हैं। लेकिन विदुर कूटनीतिक थे। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए नींद न आने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे, एक व्यक्ति जिसकी अनुचित कामनाएं हैं, ऐसा व्यक्ति जो दूसरे की संपत्ति हथियाना चाहता है, ऐसा व्यक्ति जिसकी संपत्ति छिन गई है, ये सभी लोग नहीं सो सकते। फिर विदुर ने पूछा कि क्या धृतराष्ट्र इनमें से किसी श्रेणी में आते हैं।

अगर विदुर ने राजा की सीधे आलोचना की होती तो शायद धृतराष्ट्र उनकी आगे ही बात नहीं सुनते। और अपने देश व परिवार के लिए चिंतित बुद्धिमान विदुर चाहते थे कि राजा सही निर्णय लें। इस छोटी-सी कहानी की सीख यह है कि जो किसी को सलाह देता है उसे विदुर की तरह व्यावहारिक होना चाहिए और सुनने वाले को परेशान नहीं करना चाहिए।

मुझे ‘अच्छाई में व्यावहारिकता’ की यह कहानी याद आई जब मुझे ‘स्टिच इन टाइम’ नाम के प्रोजेक्ट से जुड़ी 18 महिलाओं के बारे में पता चला। यह प्रोजेक्ट गोवा पुलिस की एंटी-ट्रैफिकिंग यूनिट के लिए एक नोडल एनजीओ ‘अन्याय रहित जिंदगी’ के सहयोग से कलाकार हर्षदा सोनक के साथ चलाया जा रहा है।

यहां किसी के पति पुताई का काम करते थे, जबकि कुछ टैक्सी ड्राइवर थे और कुछ गोवा बीच पर गुमटियों में काम करते थे। इनके परिवार की महिलाएं आस-पास के घरों में काम करती थीं और कमाई में मदद करती थीं। आज, कई पति-पत्नियों के पास काम नहीं है। उनकी बचत खत्म हो गई, जब मार्च और मई के बीच संपूर्ण लॉकडाउन था। वे दरअसल संघर्ष कर रहे थे लेकिन उनमें राहत सामग्री की लाइन में लगने का साहस नहीं था। वे सबसे ज्यादा प्रभावित थे।

इस प्रोजेक्ट के तहत चयनित महिलाएं दान में मिली सिल्क साड़ियों से दुपट्‌टा या स्टोल्स जैसे फैशन आइटम सीती हैं, जिसके लिए उन्हें 800 रुपए प्रति पीस मिलते हैं। प्रोजेक्ट के लिए उन्हीं महिलाओं को चुना गया जिनके परिवारों में कोविड-19 की वजह से पुरुषों की नौकरी चली गई है और उन्हें कोई अन्य रोजगार नहीं मिल रहा। यही कारण है कि सोनक और एनजीओ के निदेशक अरुण पांडे ने इन 18 महिलाओं को चुना।

हर हफ्ते लाभार्थी तैयार उत्पाद को केंद्र पर लाती हैं। गुणवत्ता जांच के बाद पैसे दे दिए जाते हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो आधारभूत आजीविका के लिए कुछ काम चाहते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था का पहिया चलने लगेगा। और यह जरूरी नहीं कि अच्छाई की ऐसी पहल का मतलब हमेशा प्रभावित व्यक्ति को कोई राहत सामग्री देना ही हो।

फंडा यह है कि अब समय आ गया है जब आपके परोपकारी काम में कुछ व्यावहारिकता भी होनी चाहिए ताकि उसका असर लंबे समय तक रहे।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

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