सामुदायिक सेवा से मानवता को अगले स्तर पर ले जाएं

बेंगलुरू देश का पहला ऐसा महानगर हो गया है, जहां थूकने के खिलाफ कानून बना है। कानून के तहत आमतौर पर जुर्माने या सजा का प्रावधान होता है, लेकिन यह कानून जरा अलग है। आप बेंगलुरू की सड़कों पर थूकते हैं तो आपसे 1000 रुपए जुर्माना वसूला जाएगा, दूसरी तरफ आपको किसी सार्वजनिक कार्यालय या सरकारी दफ्तर में सामुदायिक सेवा में एक दिन गुजारना होगा, जिससे संभव है कि आपके अंदर कुछ अच्छाई पैदा हो जाए, क्योंकि सेवाकार्य से व्यक्ति जमीनी हकीकत से जुड़ता है। दूसरी बार गलती करने वालों के लिए प्रावधान और भी कड़े हैं। उस स्थिति में जुर्माने में 3 हजार रुपए भरने के साथ तीन दिन सामुदायिक सेवा देनी होगी। इसके बाद भी गुस्ताखी करने पर 5 हजार रुपए जुर्माने के साथ पांच दिन की सामुदायिक सेवा देनी होगी। बेंगलुरू से दूर बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस साल 27 अगस्त को कई जनहित याचिकाएं दायर करने वाले शख्स को मुंबई के समुद्र तटों पर यह सिद्ध करने भेजा है कि वह वाकई सामाजिक आंदोलनकारी है। उसे सोमवार, 2 सितंबर-2019 को काम शुरू करना है और वरसोवा व दानापानी बीच साफ करने हैं। शाम को वह संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के आसपास व्यावसायिक संस्थानों और झुग्गी बस्ती वासियों को ट्रेनिंग देगा कि प्लास्टिक का उपयोग कैसे घटाया जाए। रविवार को वह मीठी नदी जाएगा, जो हमेशा से मुंबई में जलजमाव व बाढ़ जैसी स्थितियों अौर समस्याओं की वजह रही है। दो और लोगों को उसी कोर्ट ने बीच की सफाई के लिए भेजा है। 2017 में दो भाई कथित रूप से एक होटल में रात 2:30 बजे घुसे और उसे खोलने की मांग की। उन्होंने मैनेजमेंट को धमकाने के लिए खिलौने वाली बंदूकें लहराईं। जब मामला अक्टूबर 2018 में सुनवाई के लिए आया तो इन भाइयों ने उसे खारिज करने की गुहार लगाई। हाईकोर्ट ने शर्त रखी कि यदि एफआईआर खारिज करवाना है तो उन्हें बीच सफाई संबंधी सामुदायिक सेवा के रोस्टर में नाम लिखाकर एक माह तक प्रतिदिन दो घंटे सेवा देनी होगी। दोनों को ख्यात पर्यावरणवादी अफरोज़ शाह के मार्गदर्शन में काम करना होगा। शाह को उनके काम को लेकर प्रतिदिन रिपोर्ट तैयार कर माह के अंत में पूरा ब्योरा पुलिस को पेश करना है। पुलिस ही कोर्ट को सूचना देगी कि बीच की सफाई करने का दोनों भाइयों को दिए अादेश पर अमल हो गया है।
एक अन्य मामले में भी कोर्ट ने बीच की सफाई करने का आदेश दिया। इसमें एक किशोर पर स्टाकिंग यानी पीछा करने का आरोप था। उसे भी शाह के संरक्षण में भेज दिया गया। इस साल 17 जुलाई को आदेश देते हुए जज ने कहा कि यदि इस किशोर को जुर्माना भरने को कहा गया तो उसके पिताजी को जुर्माने की रकम देनी होगी। अदालत ने महसूस किया कि सामुदायिक सेवा करने से उसका भला होगा। इस किशोर ने हर हफ्ते आठ घंटे वाली इस सामुदायिक सेवा का महीना इसी हफ्ते पूरा किया है। जिन लोगों ने सामुदायिक सेवा की है उन्होंने महसूस किया कि यह सफाई सिर्फ कचरा उठाने भर का मामला नहीं है। यह अपना व्यक्तित्व निखारने का एक तरीका है। दोनों भाइयों ने माना कि इस सामुदायिक सेवा से उन्हें नि:स्वार्थ सेवा का सबसे बड़ा सबक मिला। जब उन्होंने इतनी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक का कचरा देखा तो अपनी दैनिक गतिविधियों में भी प्लास्टिक के इस्तेमाल को अवॉइड करना सीख गए हैं, क्योंकि यह शिक्षाप्रद अनुभव था। यह सिर्फ किसी के द्वारा धरती पर कार्बन फुटप्रिंट न छोड़ने की बात नहीं थी बल्कि इससे उन्हें अपनी सोच बदलने में मदद मिली। उन्हें विनम्रता और नि:स्वार्थ कर्म को समझने में मदद मिली, क्योंकि सारे आयु समूह व सामाजिक स्तरों के लोग कंधे से कंधे लगाकर बीच सफाई की गतिविधियों में भाग लेते हैं। दूसरे की अच्छाई का काफी असर पड़ता है। मंदिरों और खासतौर पर गुरुद्वारा में सेवा देने वाले लोगों को याद करें, वहां समुदाय में सबसे धनी लोग श्रद्धालुओं के जूतों की पॉलिश करते हैं?
फंडा यह है कि  सामुदायिक सेवाएं लोगों में बेहतरी की दिशा में बदलाव लाती है और उन्हें इस बात की शिक्षा देती है कि समाज को लौटाने का सच्चा अर्थ क्या है।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु

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