स्वार्थी दुनिया में नि:स्वार्थता की चमक, ऐसी उदारता से हमारा समाज हराभरा और खुशहाल बनता है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हम सभी ‘टू मिनट नूडल्स’ की दुनिया में रहते हैं। हम न सिर्फ सभी भौतिक सुख चाहते हैं, बल्कि अगर हम उदारता का छोटा-सा काम भी करते हैं तो सराहना और पहचान चाहते हैं। वर्ना आप इस घटना के बारे में आप क्या कहेंगे। सोशल मीडिया पर एक चिट्ठी वायरल हो रही है, जो कई राज्यों में चल रहे कोविड केयर सेंटर्स (सीसीसी) में मरीजों की मूल्यवान चीजों की सुरक्षा पर सवाल उठा रही है।

मदद की गुहार लगा रही यह चिट्‌ठी ऋतिक्षा की है, जिसने कोरोना से मां को खो दिया। उसका आरोप है कि मां का फोन बेंगलुरु के उस अस्पताल से चोरी हो गया, जहां वे भर्ती थीं। उस भावुक चिट्ठी में उसने कहा कि मां के जाने से वह अनाथ हो गई है और प्रार्थना की है कि जिसने भी मोबाइल लिया हो, वह लौटा दे क्योंकि फोन में मां की यादें हैं। सिर्फ कर्नाटक में ही नहीं, बल्कि मुंबई जैसे अमीर शहरों में भी सीसीसी में भर्ती मेरे दोस्तों के साथ ऐसा हुआ है।

उनके मोबाइल चोरी हुए और मुझे खुद मेरे नाम पर ली गई नई सिम के साथ उन्हें दूसरा फोन देना पड़ा क्योंकि वे खुद स्टोर नहीं जा सकते। सीसीसी जान बचाने में अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन कुछ लोगों के कारण ऐसी गुहार उनकी छवि खराब कर रही है। लेकिन इन दु:खद दिनों में उम्मीद की बात यह है कि कुछ लोग अब भी मदद को आगे आते हैं, यह जानते हुए भी कि सोशल मीडिया पर फोटो डालकर सराहना करना तो दूर, जरूरतमंद एक धन्यवाद कहने तक की स्थिति में नहीं होता।

पुणे के खराड़ी की टस्कन एस्टेट हाउसिंग सोसायटी का उदाहरण देखें, जिसने सोसायटी से लगी 150 मीटर की सार्वजनिक रोड पर एक भी पेड़ को मुरझाने या मरने नहीं दिया। नगरीय निकाय द्वारा लगाए गए पौधों को बचाने के लिए करीब 400 रहवासियों ने अपनी 22 मंजिला बिल्डिंग की छत से फुटपाथ और पूरी सड़क तक के लिए ड्रिप सिंचाई पाइपलाइन बिछा दी। उन्होंने पाइपलाइन रिसायकिल वाटर टैंक से जोड़ी, जो टॉयलेट फ्लश में इस्तेमाल होती थी। उन्हें लगा कि रिसायकल पानी में प्राकृतिक फर्टिलाइजर वाले तत्व हो सकते हैं।

गुरुत्वाकर्षण की ताकत के कारण लंबे टॉवर से पानी लाने में बिजली नहीं लगती, जिससे सोसायटी दिन में दो बार पानी दे पा रही है। सदस्यों के दान और 20 हजार रुपए से योगदान से किया गया यह प्रयास बहुत आसान है और किसी भी ऊंची इमारत में अपनाया जा सकता है। रहवासियों ने सिर्फ अपनी सूझबूझ इस्तेमाल किया। शहर में पानी की कमी भी होगी तो भी इस सड़क के पेड़ नहीं सूखेंगे। बमुश्किल कुछ 100 लीटर पानी ही पूरी सड़क को हराभरा रखता है और यह भी टॉयलेट के लिए इस्तेमाल होने वाला रिसायकिल्ड पानी है।

उन्होंने ऐसा पहले लॉकडाउन में किया था, जब नगरीय निकाय का ध्यान 2020 की गर्मी में पेड़-पौधे बचाने से ज्यादा इंसानी जानें बचाने में था। और इसका नतीजा 2021 में दिख रहा है। एक भी पेड़ नहीं मरा और सभी 10 फीट से ज्यादा ऊंचे हो गए हैं, जिससे पूरा रास्ता हरा-भरा और खूबसूरत दिख रहा है।

फंडा यह है कि जब आप ऊंचे हो जाते हैं (ऊंची सोसायटी पढ़ें), तो जमीन पर मौजूद जिंदगियों की परवाह करना आसान हो जाता है, खासतौर पर वे जिंदगी जो बोल नहीं सकतीं। ऐसी उदारता से हमारा समाज हराभरा और खुशहाल बनता है।

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