हमारी अगली पीढ़ी की खातिर, हमें खाने की बर्बादी और जंक फूड पर शीघ्र बदलाव अपनाना होगा, जल्द ये दो बदलाव कर हमारे बच्चों को बचाएं

दो वैश्विक बदलावों के बारे में पढ़कर मुझे चार्ल्स डार्विन की याद आई जिन्होंने कहा था, ‘न सबसे मजबूत प्रजाति बचेगी, न ही सबसे बुद्धिमान। वही प्रजाति बचेगी जो बदलावों को सबसे अधिक स्वीकार करेगी।’ और उनके शब्द इस समय की जरूरत हैं, खासतौर पर तब, जब भविष्य अनिश्चित लग रहा है। मैं यहां तक कहना चाहूंगा कि भले ही बदलाव का विचार ऐसे व्यक्ति या जगह से आता है, जो हमें पसंद न हो, लेकिन अगर हमारे लिए सही है, तो हमें जितने जल्दी हो सके, उस बदलाव को अपना लेना चाहिए।

यही कारण है कि मुझे दो बड़े वैश्विक बदलाव पसंद आए। एक चीन से और दूसरा मैक्सिको से। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘चौंकाने वाली और दु:खद’ खाने की बर्बादी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की है और देश तेजी से प्रतिक्रिया दे रहा है। न सिर्फ रेस्त्रां दरवाजों पर ग्राहकों का वजन तौलने के लिए इलेक्ट्रॉनिक स्केल लगा रहे हैं, ताकि वे ज्यादा ऑर्डर न करें, बल्कि स्कूल भी रोजाना तय सीमा से ज्यादा मात्रा में खाना छोड़ने वाले छात्रों के छात्रवृत्ति आवेदनों पर रोक लगा रहे हैं। शी का ‘क्लीन प्लेट’ कैंपेन सीधे चीन की खाने की संस्कृति के दिल पर हमला कर रहा है। चीन हर साल अनुमानित 1.8 करोड़ टन खाना बर्बाद करता है, जो सालभर तक 3 से 5 करोड़ लोगों का पेट भर सकता है!

दुनिया के दूसरे छोर पर, कई मेक्सिकन शहर बच्चो में बढ़ते मोटापे को देखते हुए जंक फूड पर बैन लगा रहे हैं, जो बच्चों में संक्रमण और गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ा रहा है। महामारी से इस बारे में बहुत जागरूकता आई है कि मेक्सिकन कुछ बीमारियों से इतने असुरक्षित क्यों है और इसीलिए यह बैन लागू किया गया। जंक फूड विरोधी कानून को कुछ राज्यों 32 में से 31 वोट मिले, जहां 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को चिप्स, कैंडी, सोडा और अन्य मीठे पेय बेचने को सिगरेट और शराब बेचने जैसा अपराध माना गया है। नए कानून में बार-बार उल्लंघन करने वाले पर जुर्माना, दुकान बंदी और जेल तक का प्रवाधान है। बैन स्कूलों की वेंडिंग मशीनों पर भी लागू है।

महामारी की वजह जन स्वास्थ्य के महत्व पर अब ज्यादा जोर है। स्वाभाविक है कि ‘7 से 11’ दुकानें (भारत में किराना स्टोर), जो सोडा और चिप्स जैसे सामानों की बिक्री पर काफी निर्भर रहती हैं, उनका व्यापार प्रभावित होगा और अब वे बच्चों को लुबाने के लिए नए तरीके सोच रही हैं। मेक्सिकन्स के लिए यह जरूरी है क्योंकि उनमें से 73% को ओवरवेट माना गया है और उनमें भी 34% गंभीर मोटापे का शिकार हैं। यह राष्ट्रव्यापी कानून अक्टूबर से लागू होगा। इसके तहत अतिरिक्त शुगर, सैचुरेटेड फैट और एडेड सोडियम वाले खाने के पैकटों पर काला स्टॉप साइन जरूरी होगा और इन्हें बच्चों को नहीं बेच सकेंगे। रोचक बात यह है कि इसमें सिविल सोसायटी संगठन और अकादमिक संस्थान सोशल मीडिया के माध्यम से साथ देते हुए दिखा रहे हैं कि कैसे अगली पीढ़ी को बचाने के लिए इस कानून को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

याद रखिए, घर से काम करने, सीमित सामाजिक मेल-जोल और रोजमर्रा की गतिविधियां कम करने से दुनियाभर में लोगों को अपना स्वस्थ वजन बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। और किराने की दुकानों पर कम जाने की वजह से ज्यादा जंक फूड और पेय पदार्थ लाने की नई आदत भी पड़ गई है।

फंडा यह है कि हमारी अगली पीढ़ी की खातिर, हमें खाने की बर्बादी और जंक फूड पर शीघ्र बदलाव अपनाना होगा। जल्द ये दो बदलाव कर हमारे बच्चों को बचाएं।
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

Leave a Reply