हमें विकास और सुविधाओं में विश्वास होना चाहिए और उनमें भविष्य की सोच भी हो

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हम जानते हैं कि इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी के कारण कई दूरदराज के गांवों को स्वास्थ्य, दूरसंचार, सरकारी सप्लाई योजना आदि सेवाओं का लाभ नहीं मिलता। कोरोना के दौरान वर्क फ्रॉम होने (डब्ल्यूएफएच) होने के बावजूद ज्यादातर शहरी आईटी वर्कर अपने गांव नहीं गए क्योंकि वहां इंटरनेट स्पीड कम होने के कारण में डब्ल्यूएफएच नहीं कर सकते। चूंकि डब्ल्यूएफएच भविष्य में भी चलता रहेगा इसलिए कई कर्मचारियों की इच्छा है कि हर गांव में कम से कम एक इंटरनेट पार्क उपलब्ध होना चाहिए।

यह कदम बड़ा बदलाव ला सकता है, यह सोचकर आंध्र प्रदेश ने भारत के अपनी तरह के पहले ‘विलेज इंटरनेट पार्क’ (वीआईपी) बनाने का फैसला लिया। वीआईपी में मुफ्त तेज इंटरनेट दिया जाएगा। शहरी केंद्रों और विदेश से अपने मूल गांव लौट रहे लोगों को इससे लाभ होगा। एक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई गई है और एपी फाइबरनेट कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों ने पायलट प्रोजेक्ट के लिए गांव चुनकर वहां भूमिगत केबल का काम शुरू कर दिया है, ताकि इन पार्कों में बिजली या इंटरनेट से जुड़ी बाधाएं न आएं।

आंध्र में करीब 10 लाख घरों में इंटरनेट कनेक्शन हैं और 50 लाख घर और जुड़ने की संभावनाएं है। पायलट प्रोजेक्ट के बाद इसमें और गांव जोड़ जाएंगे। दिलचस्प यह है कि एक लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरी इलाकों को योजना से बाहर रखा गया है। वीआईपी योजना सिर्फ ऐसे गांवों के लिए है, जहां आज इंटरनेट सुविधा नहीं है।

ऐसी प्रगतिशील प्रक्रियाओं से विपरीत महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड (एमएसईबी) जैसे बड़े विद्युत वितरण कॉर्पोरेशन की सोच आदिम काल की है। नासिक जैसे शहर का उदाहरण देखें, जो वित्तीय राजधानी मुंबई के करीब है और इसीलिए मुंबईकर यहां अपना दूसरा घर बनाने में निवेश करते हैं। इगतपुरी के पास, समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित नासिक शहर का मौसम अंगूर की खेती के लिए मुफ़ीद है।

यह बेशक रियल इस्टेट में निवेश के लिए अच्छी जगह है क्योंकि यहां सह्याद्री शृंखला की शुद्ध हवा है। लेकिन यहां के मकान मालिक अपना घर एक महीने से ज्यादा बंद नहीं रख सकते। चोरी के डर से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि एमएसईबी आपसे उस बिजली का पैसा ले लेगा, जो आपने इस्तेमाल ही नहीं की। अगर घर बंद मिलता है, तो यह आपके द्वारा बिजली की अधिकतम खपत को बेस एवरेज मानकर, उतने का बिल थमा देते हैं।

एमएसईबी का ‘महावितरण’ ऐप ग्राहकों पर भरोसा नहीं करता, जब वे खुद बताते हैं कि उन्होंने कितनी यूनिट खर्च कीं। ऐप मालिक के रजिस्टर्ड फोन से मीटर की लाइव फोटो मांगता है और पड़ोसी या केयरटेकर द्वारा खींची गई फोटो नहीं स्वीकारता।

ऐसे दौर में, जहां बैंक खाता खोलने में भी सेल्फ-अटेस्ट कागजात लगते हैं, वहां एमएसईबी खुद घोषित की गई प्रतिमाह खपत को नहीं मानता। वे चाहते हैं कि जब मीटर रीडिंग वाला आए तो मालिक हमेशा घर पर मिले। मीटर रीडिंग के ऐसे पिछड़े तरीके से घर में नहीं रह रहे उपभोक्ताओं और एमएसईबी के बीच विवाद होते हैं। हमारी मानसिकता बदलने का समय आ गया है।

हमें उपभोक्ताओं पर भरोसे की शुरुआत करनी होगी। आज हम आजाद भारत में हैं और हमारी मुख्य जिम्मेदारी है कि हम हमारे भाई-बहनों पर तब तक भरोसा करें, जब तक साबित न हो जाए कि उन्होंने धोखा दिया। और धोखा देने की मानसिकता वाले बहुत कम लोग हैं।

फंडा यह है कि विकास और सुविधाओं में विश्वास हो और उनमें भविष्य की सोच भी हो।

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