हर पिता को ‘उड़ता बच्चा’ नहीं चाहिए होता

यह 1976 में मेरी 10वीं की परीक्षा का परिणाम आने के पहले की बात है और निश्चित ही यह कोई फादर्स डे नहीं था और न मैं इस बारे में कुछ जानता था। नागपुर के हमारे घर के बाहर के बरामदे में मौजूद पिता बहुत विचलित थे और रोज की बजाय उनका स्वर कुछ ऊंचा हो गया था। ठेकेदार ने मरम्मत की लागत दोगुनी कर दी थी और उन्हें इसकी अपेक्षा नहीं थी।
मैं उनकी बातचीत का मूकदर्शक था। मेरी सहज बुद्धि बता रही थी कि ठेकेदार मेरे पिता की दृष्टि विकलांगता का फायदा उठाकर उन्हें लूट रहा है। फिर मैंने उस मामले में दखल देकर एक-एक आइटम की कीमत पर बहस करके मेरे पिता के 280 रुपए बचा लिए। मैं उनके चेहरे पर मुस्कान व गर्व देख रहा था। कुछ विजयी भाव के साथ उनके दाएं हाथ ने पैसे का भुगतान किया और उनका बायां हाथ मेरे सिर को प्यार से सहला रहा था, जो कुछ कह रहा था। आज मैं उस भावना का अनुवाद करता हूं तो लगता है जैसे वे कह रहे थे, ‘जब तक मेरे साथ इसके जैसा जागरूक बेटा है, कोई मुझे लूट नहीं सकता।’
उसके बाद उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा, क्योंकि वे मुंह पर प्रशंसा करने वाले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन उन्होंने मेरी जान-पहचान के आधा दर्जन लोगों को बताया होगा कि कैसे उनके पुत्र ने उनकी गाढ़ी कमाई को बचा लिया था। किफायत के उन दिनों में 280 रुपए बहुत बड़ी रकम थी। उसके बाद से वे बाहर के लोगों के साथ होने वाले पैसे के लेन-देन में मुझे जरूर शामिल करते और पिता-पुत्र के बीच भरोसा धीरे-धीरे वैसे ही बढ़ता गया, जैसे छोटा बच्चा धीरे-धीरे कदम बढ़ाता है। हालांकि, मुझे यह याद नहीं था कि कैसे उन्होंने पहली बार मेरी उंगलियां थामकर मुझे चलना सिखाया था, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उन्होंने मुझे बाहरी लोगों के साथ आर्थिक व्यवहार की राह पर कैसे 15 से 17 साल की उम्र में चलना सिखाया था। शायद उन्हें अहसास था कि आयु के 18 साल पूरे होते-होते मेरे लिए खुद का काम तलाशने का वक्त आ जाएगा। उसके पहले यह जरूरी था कि मुझे वे अार्थिक लेन-देन में माहिर बना दें। 12वीं की परीक्षा देने के बाद मैंने अपनी राह तलाशने के लिए घर छोड़ दिया।
पढ़ाई जारी रखते हुए मुझे अपना पहला जॉब मिला और उस दिन उन्होंने मुझ पर जिम्मेदारी की बमबारी-सी कर दी, ‘आज के बाद तुम्हें पूरे घर का खर्च चलाना है। मुझे तुम्हारी बहन की शादी और हम सब के लिए मकान बनाने के लिए पैसा बचाने की जरूरत है। तुम्हें तो पता है कि अगले 12 वर्ष में मैं रिटायर हो जाऊंगा।’ उसके बाद मैंने कभी अपने हाथ में पूरी सैलरी नहीं देखी। वेतन मिलने के दो दिन पहले, खर्च की सूची तैयार होकर तीन बार उसकी जांच भी हो जाती कि कोई गैर-वाजिब खर्च तो नहीं है। मैं अपने पिता, मां या बहन को तोहफा देकर चकित करने का आनंद व्यक्तिगत खर्च में कटौती के बिना कभी नहीं मिला। यदि मैं इधर-उधर से कटौती करके उन पर खर्च करता तो वे पूछते कि यह पैसा कहां से आया। मेरे साथ के लोग बैंक से पैसा उधार लेकर वाहन खरीद रहे थे, लेकिन उन्होंने मुझे कभी ऊंचे उड़ने नहीं दिया और जब तक नींव मजबूत नहीं हुई तब तक जमीन पर बनाए रखा। इस दौरान वे मेरी पढ़ाई के बारे में पूछताछ करना नहीं भूलते, क्योंकि वे मानते थे कि यह नींव का हिस्सा है।
एक दशक बाद मैंने बहुत बड़ा निवेश किया और आश्चर्य की बात रही कि इस बार मां ने चौंकते हुए पूछा कि पैसा कहां से आया, लेकिन मेरे पिता ने शांत स्वर में उन्हें आश्वस्त किया, ‘चिंता मत करो, वह सबकुछ समझता है।’ संयोग से उस दिन जून माह का तीसरा रविवार था, जिसे फादर्स डे के रूप में मनाया जाता है। उस दिन हम दोस्त हो चुके थे, क्योंकि भरोसे ने हमें अच्छी तरह जोड़ दिया था।
फंडा यह है कि ज्यादातर भारतीय मध्य वर्ग के पालक शायद ही कभी ‘उड़ता बच्चा’ चाहते हैं, जो सबकुछ थोड़े ही समय में हासिल कर लेता है। उन्हें तो धीरे-धीरे लगातार प्रगति करना वाला बच्चा चाहिए होता है, जो खुशी व सुरक्षा को कायम रख सके।

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