हर पेशेवर को कानून के पीछे की भावना पता हो

‘एक बेगुनाह को सज़ा मिलने से बेहतर है 10 गुनहगारों का छूट जाना।’ यह कथन 19वीं सदी की शुरुआत में कहावत बन गया था, जिसे कई देशों ने आम कानून में अपनाया और बाद में यह मानक सिद्धांत बन गया, जिसे 21वीं सदी में कानून के छात्रों को याद कराया जाने लगा। याद रखें कि इस कहावत को कई देशों के संस्थापकों ने भी दोहराया। लेकिन अब समय आ गया है कि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े पेशेवर कानून के केवल शब्द न समझें, बल्कि उनके पीछे की भावना के सबक भी समझें। वरना इस मामले को कैसे समझाएंगे, जिसमें आगरा के बाह निवासी 40 वर्षीय नरेंद्र सिंह और उनकी 30 वर्षीय पत्नी नजमा को 2015 में ऐसे अपराध में गिरफ्तार कर जेल में रखा गया, जो उन्होंने किया ही नहीं था।

उनके बेटे और बेटी, जो तब क्रमश: 5 और 3 वर्ष के थे, को माता-पिता की गैरमौजूदगी में ‘किसी अनाथालय’ भेज दिया। किसी कानूनी एजेंसी को इस शनिवार तक जानकारी भी नहीं थी कि बच्चे कहां हैं। फिर इस शनिवार मीडिया में खबरें आने के बाद बच्चों को खोजा गया, जो किसी बाल गृह में पाए गए। पांच वर्ष के बच्चे की हत्या के बाद स्थानीय पुलिस ने नरेंद्र (पेशे से शिक्षक) और नजमा को किसी तथ्यात्मक सबूत के अभाव में परिस्थिति आधारित सबूत के आधार पर गिरफ्तार किया था। तब सुनवाई करने वाले अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने कहा कि ‘जांच अधिकारी के साथ काम कर रहे तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर चिदानंद सिंह ने कोर्ट में स्वीकारा था कि उन्होंने यह पता करने की कोशिश भी नहीं की थी कि एफआईआर किसके खिलाफ दर्ज है।’

दंपती को रिहा करने के अपने आदेश में कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बेकसूर लोगों ने जेल में 5 साल बिताए और अपराधी आजाद घूम रहा है।’ कोर्ट ने एसएसपी को जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया है, साथ ही उपलब्ध सबूतों के आधार पर मामले की दोबारा जांच की अनुसंशा भी की है। रिहा होने पर दंपती अपने बच्चों को नहीं खोज पाए। फिर मीडिया के दखल ने अधिकारियों को उन्हें खोजने पर मजबूर कर दिया। यकीन मानिए, उन बच्चों और बेगुनाह माता-पिता ने जो झेला है, उसकी भरपाई संभव नहीं है। एक अन्य दिलचस्प मामले में 18 वर्षीय धारिणी एचआर को II पीयू (प्री यूनिवर्सिटी) एकाउंटेंसी परीक्षा में अपने हक का ‘एक अंक’ पाने के लिए पांच महीने तक दौड़भाग करनी पड़ी। कोर्ट के दखल के बाद आखिरकार उसे 100/100 अंक मिले। यह सब जुलाई 2020 में शुरू हुआ, जब II पीयू के नतीजे घोषित हुए और कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के होसानगर तालुक में हनिया गांव की धारिणी अपने अंकों को लेकर उत्साहित थी। लेकिन कुछ गड़बड़ हुई। उसे एकाउंटेंसी में 99 अंक मिले, जबकि उसे भरोसा था कि उसकी उत्तरपुस्तिका में एक अंक कटने की भी गुंजाइश नहीं है। उसने रि-टोटलिंग का आवेदन दिया। लेकिन वह हैरान रह गई, जब उसके अंक 100 की जगह 88 कर दिए गए।

दु:खी होकर उसने फिर पुनर्मूल्यांकन का आवेदन दिया लेकिन इसका प्रावधान नहीं था और 88 ही उसके अंतिम अंक बन गए। तब धारिणी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के आदेश पर अंतत: 15 जनवरी को उसके नतीजे की घोषणा हुई, जिसमें उसे 100 में से 100 अंक मिले। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि छात्र विश्वविद्यालय के नियमों की क्या ‘कीमत’ चुकाने को मजबूर हैं?

फंडा यह है कि जनता के साथ काम कर रहा हर पेशेवर किसी न किसी कानून के आधार पर काम करता है और उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे सिर्फ कानून की सख्ती ही नहीं, उसके पीछे की भावना को भी समझें और आम लोगों के हित के लिए काम करें।

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