हुनर किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती, वह हुनर स्थायित्व देता है जो किसी पर निर्भर रहे बिना कुछ निर्मित कर सके

कुछ समय पहले मुझे मध्यप्रदेश में इंदौर के निकट पिथमपुर स्थित एक मैन्यूफैक्चरिंग इकाई में आमंत्रित किया गया था। जहां स्कूल बस के पीछे लगने वाली सीढ़ी, स्कूल के बेंच का आधार, धातु के कबर्ड आदि जैसी धातु की वस्तुएं बनती हैं। मैंने एक युवा को देखा, जिसके काम में जाहिर है काफी अचूकता की जरूरत थी। एकाग्रता में एक क्षण का भी विचलन किसी गंभीर जख्म का आमंत्रण बन सकता है। वह एक बड़ी सी धातु की शीट को आकार देने के बाद उसमें छेद बना रहा था ताकि उसमें स्क्रू कसे जा सके। जब मैं वहां खड़ा था तो कुछ ही मिनटों में उसने ऐसा बॉक्स बना दिया, जो आमतौर पर किसी कबर्ड के दरवाजे के पीछे लगाया जाता है, जिसमें हम आगे से सुरक्षा की दृष्टि से लॉक करते हैं। जब मैं उसकी अचूकता पर चकित था, तो मेरा उससे परिचय कराया गया। बताया गया कि उसके पास कोई प्रमाण-पत्र नहीं है और न किसी संस्थान से प्रशिक्षण हासिल किया है। काम करते-करते ही उसने कबर्ड बनाने में महारत हासिल कर ली। वह अकेला नहीं था। उस असेंबली लाइन में कई और भी थे, जो किसी निजी कंपनी के लिए एक घंटे से कम वक्त में एक कबर्ड बना देते हैं। यह कंपनी सिर्फ अपना लेबल लगाकर लागत से 60 फीसदी अधिक कीमत पर उसे बेचती है। इन सभी ने कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था। वह निजी कंपनी डिज़ाइन, क्वालिटी और स्डैंडर्ड ऑपरेटिग प्रोसीजर तय कर देती है। उस फर्नीचर निर्माण इकाई के 50 कर्मचारियों में से केवल चार लोगों के पास किसी इंस्टीट्यूट का प्रमाण-पत्र था शेष ज्यादातर कर्मचारी स्वप्रशिक्षत थे।
इससे मुझे कोलकाता स्थित रामकृष्ण मिशन ब्लाइंड बॉयज़ एकेडमी की याद आई, जहां दृष्टिहीन किशोर इसी अचूकता से चीजें बनाते हैं। यहां से प्रशिक्षित 300 से ज्यादा दृष्टिबाधित युवा रेलवे, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी कंपनियों में कोई चीज निर्मित करने की अपनी व्यक्तिगत काबिलियत के कारण रोजगार में लग गए। शायद यही कारण था कि 12वीं कक्षा के एक दुबले से लड़के ने मुझसे जब उस शाम क्रिकेट में कॅरिअर बनाने के अवसर के बारे में पूछा तो मैंने उससे सवाल किया, ‘वह क्या निर्मित कर सकता है?’ उसने कहा, ‘रन, विकेट और कैच।’ उस उम्र में वह लड़का यह नहीं समझ सका कि आप सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञ नहीं हो सकते। दूसरी बात क्रिकेट जैसे खेल में ‘अवसर’ मुख्य कुंजी है। रन बनाने के लिए आपको बल्लेबाजी क्रम में शीर्ष पर होना चाहिए और आप हर गेंदबाज की धुनाई करने के काबिल होने चाहिए। खुद को अच्छा फील्डर साबित करने के लिए बल्लेबाज को गेंद को उस ओर मारना चाहिए, जहां आप फील्डिंग कर रहे हैं। विकेट लेने के लिए गेंदबाज को विपक्षी टीम को ज्यादा रन दिए बिना अधिक से अधिक गेंदबाजी करने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन, क्रिकेट में एक काम ऐसा है, जो कोई व्यक्तिगत रूप से मैदान पर गेंद दर गेंद जारी रख सकता है और वह जॉब है अम्पायरिंग का। हमारे देश में कुछ ही युवा इस काम में रुचि दिखाते हैं, जबकि यह काम तो 65 की उम्र में भी किया जा सकता है। अम्पायरिंग के पेशे में करीब 46.8 फीसदी अम्पायर 50 से 60 की उम्र के हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर 7.9 फीसदी अम्पायर 65 की उम्र के बाद भी अम्पायरिंग कर रहे हैं। 11 साल तक 73 मैचों में अम्पायरिंग करने वाले एस. वेंकटराघवन को छोड़ दें तो भारत में ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाला और कोई अम्पायर नहीं है। वेस्टइंडीज के स्टीव बकनर (128 मैच), पाकिस्तान के अलीम डार (122), दक्षिण अफ्रीका के रूडी कोएर्टजन (108) को छोड़ दें तो ज्यादातर अम्पायर 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाए। बेशक 95 मैच में अम्पायरिंग करने वाले ऑस्ट्रेलिया के डेरिल हार्पर और 92 मैच वाले इंग्लैंड के डेविड शेफर्ड को कौन भूल सकता है। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड ने ही सबसे सफल अम्पायर दिए हैं, क्योंकि, वहां अम्पायरिंग को ऐसे स्थिर कॅरिअर के रूप में देखा जाता है, जो पूरी तरह निरीक्षण कौशल और निर्णय क्षमता पर निर्भर है।
फंडा यह है कि कॅरिअर में स्थायित्व के लिए आपके पास ऐसा हुनर होना चाहिए, जो कुछ पैदा कर सके और जो अन्य कारकों पर ज्यादा निर्भर न हो। यह है तो फिर ऐसे जॉब देखें जो लंब समय तक चलने वाले हों।

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