ज़िंदगी की टक्कर आपके अंदर से क्या छलकाती है?

कल्पना कीजिए कि आप कॉफी का कप पकड़े खड़े हैं और कोई आदमी आपसे भिड़ जाए और पूरी कॉफी छलककर आसपास फैल जाए। सोचिए, ऐसे में आपने कॉफी को क्यों छलकने दिया होगा? आप सोचेंगे कि ये क्या बेवकूफी भरा सवाल है? हां, आपका विचार सही भी हो सकता है। मैं एक कदम और आगे जाकर आपके समर्थन में कहूंगा, ‘हां, क्योंकि कप में कॉफी थी न! अगर उस कप में चाय होती तो फिर चारों तरफ चाय उछलती। ठहिरए। मुद्दे की बात यही है कि कप में जो कुछ होगा वही तो बाहर छलकेगा।’ कई बार ज़िंदगी आपको और मुझे ऐसी तगड़ी टक्कर मार देती है, जिससे बचना मुश्किल होता है। ऐसी कोई घटना हो जाए तो आपके अंदर से बाहर क्या छलकेगा? निश्चित रूप से वही जो आपके और मेरे अंदर भरा होगा, वही तो बाहर आएगा।
ऐसे में जब आप सोच रहे होंगे कि बीते दिनों में ज़िंदगी ने जब कोई झटका मारा तो बाहर क्या छलका? इस बीच, मैं आपको 27 वर्षीय इलमा अफरोज की ज़िंदगी में लिए चलता हूं ,जो 2018 की हिमाचल प्रदेश कैडर की आईपीएस ऑफिसर हैं। यह लड़की आईपीएस अफसर इसलिए बनी, क्योंकि उसे साबित करना था ‘भारत की बेटी मजबूत है, मजबूर नहीं। वो सुरक्षा देती है, मांगती नहीं’। वह ऐसा इसलिए भी कह सकती है, क्योंकि इलमा उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद जिले से आईपीएस बनने वाली पहली लड़की है। बीते मंगलवार को इलमा मुंबई में थी, जहां बच्चों की तस्करी को लेकर एक कॉनक्लेव में बतौर वक्ता बनकर आईं थी। ज़िंदगी ने उसे पहली टक्कर तब मारी थी जब वह सिर्फ 14 वर्ष की थी। मुरादाबाद जिले के कुंडारकी गांव में रहने वाले उसके पिता का कैंसर की वजह से निधन हो गया। यहां से शुरू हुई उसकी संघर्ष यात्रा। पहले दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज पहुंची और फिर स्कॉलरशिप की मदद से उसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक लेकर गई। इसके बाद वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए स्वेदश लौट आईं। ये घटनाएं बताती हैं कि कैसे इस युवा लड़की ने ज़िंदगी की हर टक्कर को झेला और उसे एक अवसर में बदलकर आगे निकल गई। दिल्ली और सेंट स्टीफन के माहौल ने उसके अंदर अपने पक्ष को मजबूती से रखने और दूसरों को प्रभावित करने वाली लेखन क्षमता विकसित करने में मदद की और इसी की बदौलत उसे ऑक्सफोर्ड की पोस्ट ग्रेजुएशन स्कॉलरशिप मिली।
इलमा के उदाहरण से मुझे ऋचा तोमर का ध्यान आया। एक किसान की बेटी होकर भी उसने बेस्ट ऑल-राउंड लेडी आईपीएस प्रोबिशनर तक का सफर तय किया है। ऋचा ढाई साल के एक बच्चे की मां भी है और पिछले साल वह हैदराबाद की सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल पुलिस अकेडमी की 70वीं बैच से पास होकर निकली है। उसके संघर्ष की यात्रा बाकियों से थोड़ी अलग भी है। यूपी के बागपत जिले के दूरस्थ हसनपुर जिवानी नाम के गांव के खेतीहर परिवार की है ऋचा। पिता राजेंद्रपाल सिंह किसान हैं और उनके छह बच्चों में पांच लड़कियां है और ऋचा का नंबर चौथा है। माइक्रोबायोलॉजी में मास्टर्स डिग्री करने के बाद और नेशनल पुलिस अकेडमी में प्रवेश से पहले वह यूपी सरकार के साथ बतौर डीएएनआईपीएस (दिल्ली, अंडमान एंड निकोबार पुलिस सर्विस) जुड़ चुकी थी। नौकरी के साथ उसने आईपीएस की तैयारी जारी रखी। परिवार के सहयोग ने उसे यह चुनौती लेने के लिए आगे बढ़ाया और अब उसे राजस्थान कैडर मिला है। अगर इलमा यह कहती, ‘मैं गांव की लड़की हूं’ और वही ग्रामीण और ठहरी हुई ज़िंदगी जीती या ऋचा ने कहा होता, ‘ओह, मैं तो मां बन चुकी हैं और मेरे एक साल के बेटे को मेरी अभी बहुत जरूरत है’, तो ऐसे में आज ये दोनों ही कहानियां कुछ और ही होतीं।
फंडा यह है कि  ज़िंदगी आपको अचानक ही ऐसे झटके और टक्कर देती रहेगी, अब ये आपके ऊपर है कि मुकाबले में आपके अंदर से क्या छलकता है!

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