2020 में ‘पॉजीटिव’ शब्द ने भले ही हमें डराया हो, लेकिन यह हमारी जिंदगी का आधार है

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘पॉजीटिव’ 2020 में सबसे ‘निगेटिव’ शब्द था। शायद पहली बार लोग ‘पॉजीटिव’ शब्द से इतना डरे हुए थे। फिर भी वे घर में रहते हुए सकारात्मक बने रहे। लेकिन इसने उन्हें कुछ नया करने से नहीं रोका। उन्होंने अजीब व्यजंन बनाए, कम से कम नाम तो ऐसे ही थे।

कुछ लोगों ने अपनी पाककला में इतनी रचनात्मकता दिखाई कि लोग उनके स्वाद पर ही सवाल उठाने लगे। रसगुल्ला बिरयानी पर तो बिरयानी के दीवाने भी शरमा गए। फरेरो रोशर (एक चॉकलेट) मंचूरियन ने हैरान किया और लोग अपने मोबाइल पर मैगी पानीपुरी से नजरें नहीं हटा पाए। ओरियो पकोड़े, च्यवनप्राश स्मूदी और नटीला बिरयानी भी ऐसे ही व्यंजन हैं।

अब आप समझ गए होंगे कि मैंने उन्हें अजीब क्यों कहा। स्वाभाविक है कि ये सभी वायरल हुए और खाने के शौकीनों से इन्हें अलग-अलग प्रतिक्रियाएं मिलीं। लेकिन जिस तरह कक्षा आठवीं के छात्र ने इसी महामारी के दौरान खुद को खोजा, वह बताता है कि हमारे युवा भारत ने ‘महामारी’ शब्द को कितनी सकारात्मकता से लिया है। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में 14 वर्षीय अमर प्रजापति ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खुद की मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी खोली है, जिसका उद्देश्य चीनी उत्पादों की जगह भारतीय उत्पाद लाना है। यह छोटी चुनौती नहीं है।

उसने पहले एलईडी लाइट बनाने का प्रशिक्षण लिया, खुद की कंपनी खोली और कुछ ही महीनों में पांच कर्मचारी नियुक्त कर लिए। अब वह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की पूरी शृंखला लॉन्च करना चाहता है। लॉकडाउन के बाद कई लोग बेरोजगार हुए और निराश होकर अपने राज्य लौट रहे थे, तो उन्हें देखकर अमर दु:खी हुआ। एक दिन उसने अखबार में एलईडी लाइट मेकिंग के प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में पढ़ा। उसने पिता से इससे जुड़ने की इच्छा जाहिर की और वे मान गए। प्रक्रिया सीखने के बाद अमर ने घर में लाइट बनाना शुरू किया और कुछ लोगों को काम पर रखा।

हालांकि, घर में जगह की कमी के कारण काम करना मुश्किल हो रहा था। अपने पिता की मदद से उसने करीब 2 लाख रुपए का निवेश किया और एक मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी बनाई, जिसमें उसकी मां सुमन प्रजापति डायरेक्टर हैं। हाल ही में, इस छोटे आंत्रप्रेन्योर ने चार्जेबल इलेक्ट्रिक लैंप बनाया है, जो बिना बिजली के 12 घंटे चल सकता है।

एक बल्ब भी बनाया है, जो बिना बिजली तीन घंटे रोशनी देता है। कोलकाता के आयुष शारदा का उदाहरण भी देखें, जिसने अम्फान तूफान पीड़ितों की मदद के लिए ‘स्वीटनेस ऑफ एथिक्स’ नाम का सामाजिक उपक्रम शुरू किया, जो शहद जुटाकर, पैक कर बेचता है और आजीविका कमाने में मदद करता है।

द्वीप के करीब 15 हजार लोग प्रभावित हुए थे। जब ग्रामीण लौटे तो उनके घर टूट चुके थे और खेत पानी में डूब गए थे। लेकिन छह महीने बाद उनके पास नए घर हैं, महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र है, स्कूल है और बेहतर आय है। यह बदलाव आया 22 वर्षीय आयुष के प्रयासों से, जो गांव में राहत कार्य के लिए गया था।

आयुष को अहसास हुआ कि अस्थायी प्रयास नहीं टिकेंगे। चूंकि शहद बंगाल में काफी मिलता है, इसलिए उसकी टीम ने इसे ताकत बनाकर गांव के किसानों को स्वतंत्र होने और आजीविका कमाने में मदद का फैसला लिया। शहद बेचने की पहल 10 परिवारों से शुरू हुई और अब 50 तक पहुंच गई है। किसानों की औसत आय 2500 से बढ़कर 10 हजार रुपए हो गई है।

फंडा यह है कि 2020 में ‘पॉजीटिव’ शब्द ने भले ही हमें डराया हो, लेकिन यह हमारी जिंदगी का आधार है, इसीलिए इसे 2021 में भी जिंदा रखें।

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