समाज के लिए कुछ करना है तो बस दिल बड़ा होना चाहिए

मैनेजमेंट फंडा – एन. रघुरामन

रतनम्मा की 30 साल पहले शादी हुई थी। कोई संतान न थी इसलिए वे बहन की बेटी को अपना मानकर उसकी देखभाल करती थीं। लेकिन जब उन्हें मालूम हुआ कि इस दुधमुंही बच्ची को टाइप-1 डायबिटीज की बीमारी है तो वे हिल गईं। उस बच्ची की तकलीफ से उन्हें बाकी मरीजों के दर्द का भी अहसास हुआ। उन्होंने तय किया कि वे डायबिटीज के मरीजों की तकलीफ कम करने अपनी ओर से जो हो सकेगा, करेंगी। रतनम्मा के जीवन में यह नई शुरुआत थी। आज कर्नाटक में बेंगलुरू के नजदीकी रामनगर जिले के गांवों में 48 साल की रतनम्मा किसी डॉक्टर से ज्यादा लोकप्रिय हैं। उनके पास मेडिकल की कोई डिग्री नहीं है। हो भी कैसे सकती है। उन्होंने तो आठवी कक्षा तक पढ़ाई भी पूरी नहीं की है। पति ऑटो ड्राइवर हैं। फिर भी गांव के लोग उनके आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं। हफ्ते में तीन दिन वे सफेद एप्रिन पहनकर गांवों की ओर निकल जाती हैं। हाथ में होती है डायबिटीज और ब्लडप्रेशर टेस्टिंग किट। 


वे संबंधित व्यक्ति को जीवनशैली में बदलाव की सलाह देती हैं। यह भी बताती हैं कि वह क्या खाए और क्या नहीं। मामला गंभीर दिखा तो तुरंत नजदीकी अस्पताल भेज देती हैं। रतनम्मा ने जब अपनी छोटी सी बच्ची को डायबिटीज की वजह से इंसुलिन पर आश्रित देखा तो उनकी आंखें खुलीं। उन्हें इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा हुआ। उसी वक्त वे एक जनसंजीवनी नामक स्वयंसेवी संगठन के संपर्क में आईं। यह संगठन ऐसे लोगों को डायबिटीज से मुकाबले का प्रशिक्षण देता है, जिनके बच्चे, परिजन या नज़दीकी रिश्तेदार इस बीमारी से पीडि़त हैं। इस ट्रेनिंग के तहत लोगों को कई प्रकार की चीजें सिखाई जाती हैं। मसलन, मरीज का ब्लड प्रेशर चैक करना। उसके डायबिटीज के स्तर को जांचना। फिर ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं यह बताना। खान-पान कैसा हो कैसा नहीं यह समझाना। मामला गंभीर नजर आए तो उसे तुरंत अस्पताल भेजना। रतनम्मा यही सब काम कर रही हैं। उनके जैसे और भी कई वालंटियर्स जनसंजीवनी से प्रशिक्षण लेने के बाद ग्रामीण इलाकों में इसी तरह की सेवाएं दे रहे हैं। साथ ही ये लोगों को डायबिटीज से बचाव के प्रति जागरूक भी करते हैं। पीडि़तों को ये लोग बताते हैं कि इस संबंध में कहां-किस तरह की मदद उपलब्ध है।

जनसंजीवनी

जनसंजीवनी के इस प्रोजेक्ट का नाम है-मधुर संजीवनी। इसके तहत मरीजों को इंसुलिन भी उपलब्ध कराया जाता है। संगठन ने कार्यकर्ताओं के समूह को ठीक वैसे ही ट्रेंड किया है जैसे चीन में बेयरफुट डॉक्टर स्कीम के तहत गांवों में चुनिंदा किसानों को ट्रेंड किया गया है। चीन में ग्रामीण स्तर पर सामुदायिक स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने के लिए यह योजना चलाई जा रही है। इस योजना को बेयरफुट नाम दिए जाने की भी वजह है। इसलिए क्यूंकि ट्रेंड ग्रामीण हैल्थ वर्कर अक्सर जरूरतमंद के चैकअप आदि के लिए नंगे पैर ही एक से दूसरी जगह जाते हैं।


बहरहाल जनसंजीवनी ने अब तक रतनम्मा की तरह 16 वालंटियर्स को तैयार कर लिया है। इन लोगों ने पिछले चार महीने में ही बेंगलुरू से लगे ग्रामीण अंचलों में करीब 1,000 लोगों तक अपनी पहुंच बना ली है। वालंटियर्स को इजाजत है कि वे मरीजों से थोड़ी-बहुत फीस ले सकते हैं। लेकिन रतनम्मा अपनी सेवाएं मुफ्त ही देती हैं। यही नहीं वे हर इतवार जनसंजीवनी की ट्रेनिंग कक्षाओं को नियमित रूप से अटेंड करती हैं। वहां ट्रेनिंग के लिए आए नए लोगों को लेक्चर भी देती हैं। और हर बार कुछ नया सीखकर भी जाती हैं। अब यही उनका रूटीन है।

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